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ईसबगोल – Isabgol (Psyllium)

ईसबगोल

Isabgol (Psyllium)

Plantago ovata · Plantaginaceae

संस्कृत नाम: स्निग्धबीज, ईषद्गोल

जड़ी-बूटीनर्सरी में उपलब्ध
उपयोगी भागबीज की भूसी (मुख्य), बीज
तासीरठंडी
धूपपूरी धूप
पानीकम — मिट्टी सूखने पर
लगाने का समयनवंबर

संक्षेप में: स्वाद में मीठा, तासीर ठंडी। गैस, जोड़ों का दर्द और रूखापन; जलन, एसिडिटी और गर्मी जैसी तकलीफ़ों में सहायक मानी जाती है।

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परिचय

ईसबगोल 30–40 सेमी का छोटा, घास जैसे पत्तों वाला पौधा है, जिसकी सफ़ेद बालियों में बीज बनते हैं। बीज की पतली सफ़ेद भूसी पानी सोखकर फूल जाती है और जेली बन जाती है। भारत (गुजरात-राजस्थान) दुनिया का सबसे बड़ा ईसबगोल उत्पादक है।

पारंपरिक उपयोग

  1. रात को पानी या दूध के साथ ईसबगोल की भूसी कब्ज़ में सबसे प्रचलित घरेलू उपाय है।
  2. दही के साथ ईसबगोल दस्त में भी काम आता है (भूसी पानी सोख लेती है)।
  3. रेशे के कारण कोलेस्ट्रॉल और पेट भरा रखने में मदद।
  4. बवासीर में मल नरम रखने के लिए।

आयुर्वेदिक गुण

रस (स्वाद)
मधुर (मीठा)
गुण (प्रकृति)
गुरु (भारी, देर से पचने वाला), स्निग्ध (चिकनाई वाला), पिच्छिल (चिपचिपा, लसदार)
तासीर
ठंडी
दोषों पर असर
वात और पित्त को शांत करता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

ठंडी, सूखी सर्दी चाहिए। नवंबर में बीज बोएँ; धूप और रेतीली मिट्टी, कम पानी। मार्च में बालियाँ पकती हैं।

ध्यान दें

हमेशा भरपूर पानी के साथ लें, सूखा निगलने से गले-आँत में अटक सकता है। दूसरी दवा से 2 घंटे का अंतर रखें।

शब्दावली

वात
शरीर की हवा/गति वाली शक्ति; बिगड़ने पर गैस, जोड़ों का दर्द, रूखापन, कब्ज़ और बेचैनी
पित्त
शरीर की गर्मी और पाचन वाली शक्ति; बिगड़ने पर जलन, एसिडिटी, ज़्यादा गर्मी और फोड़े-फुंसी

यह जानकारी पारंपरिक आयुर्वेद और लोक-ज्ञान पर आधारित है और केवल जानकारी के लिए है, इलाज के लिए नहीं। किसी भी बीमारी में डॉक्टर या पंजीकृत आयुर्वेदिक वैद्य की सलाह से ही दवा लें, और चल रही दवा अपने आप बंद न करें। गर्भावस्था, छोटे बच्चों और पहले से दवा ले रहे लोगों को विशेष सावधानी रखनी चाहिए।

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