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आयुर्वेदिक पौधेAyurvedic & medicinal plants

103 औषधीय पौधों की पूरी जानकारी: पहचान, संस्कृत नाम, आयुर्वेदिक गुण, पारंपरिक उपयोग, घर में लगाने का तरीका और ज़रूरी सावधानी। जो पौधे हमारी nursery में मिलते हैं, उन्हें यहीं से ख़रीद सकते हैं।

  • 103 पौधे
  • 103 nursery में उपलब्ध
  • 12 पर ⚠ सावधानी

ज़रूरी सूचना: यह जानकारी पारंपरिक आयुर्वेद और लोक-ज्ञान पर आधारित है और केवल जानकारी के लिए है, इलाज के लिए नहीं। किसी भी बीमारी में डॉक्टर या पंजीकृत आयुर्वेदिक वैद्य की सलाह से ही दवा लें, और चल रही दवा अपने आप बंद न करें। गर्भावस्था, छोटे बच्चों और पहले से दवा ले रहे लोगों को विशेष सावधानी रखनी चाहिए। ⚠ निशान वाले पौधे ज़हरीले हैं — इन्हें खाएँ नहीं और बच्चों-पशुओं से दूर लगाएँ।

103 पौधे

अंगूर

अंगूर Grape

Vitis vinifera · Vitaceae (द्राक्षा कुल)

संस्कृत: द्राक्षा, मृद्वीका

फलदारNursery में उपलब्ध

अंगूर एक लंबी, फैलने वाली बेल है जिसे मंडप या तार पर चढ़ाया जाता है। आयुर्वेद में द्राक्षा (विशेषकर मुनक्का) को फलों में सबसे उत्तम बताया गया है, क्योंकि यह मीठा, ठंडा और शरीर को पोषण देने वाला है। द्राक्षासव और द्राक्षादि योग इसी से बनते हैं।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल, सूखा फल (मुनक्का/किशमिश), पत्ते
आयुर्वेदिक गुण
रस: मधुर · गुण: गुरु, स्निग्ध, मृदु · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
वात और पित्त को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • मुनक्का रात को भिगोकर सुबह खाने से कब्ज़ में हल्का आराम मिलता है।
  • बुखार के बाद प्यास, जलन और कमज़ोरी में अंगूर का रस दिया जाता है।
  • सूखी खाँसी और गले की ख़राश में मुनक्का चबाने की परंपरा है।
  • पत्तों को लपेटकर कई देशों में व्यंजन बनाए जाते हैं।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, अच्छी निकासी वाली मिट्टी और तार/मंडप का सहारा चाहिए। जनवरी–फरवरी में लगाएँ और हर साल छँटाई करें। बिहार में बारिश से पहले (मई–जून) फल पकने वाली किस्में ठीक रहती हैं।

सावधानी: शुगर के मरीज़ मात्रा का ध्यान रखें।

अंजीर

अंजीर Fig (Anjeer)

Ficus carica · Moraceae (वट कुल)

संस्कृत: अञ्जीर, काकोदुम्बरिका (कुछ ग्रंथों में)

फलदारNursery में उपलब्ध

अंजीर एक छोटा, चौड़े पत्तों वाला फलदार पेड़ है, जिसके मुलायम, मीठे, अंदर से गुलाबी दानेदार फल होते हैं। सूखा अंजीर मेवों में गिना जाता है और रेशा, कैल्शियम व आयरन से भरपूर है। यूनानी और आयुर्वेद दोनों में यह कब्ज़ और कमज़ोरी की प्रसिद्ध औषधि है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल (ताज़ा व सूखा), पत्ते
आयुर्वेदिक गुण
रस: मधुर · गुण: गुरु · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
वात और पित्त को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • सूखे अंजीर को रात भर भिगोकर सुबह खाना पुरानी कब्ज़ में पारंपरिक घरेलू उपाय है।
  • खून की कमी और कमज़ोरी में पौष्टिक आहार के रूप में खाया जाता है।
  • दूध के साथ अंजीर बच्चों और बुज़ुर्गों को ताक़त के लिए दिया जाता है।
  • कच्चे फल का दूधिया रस मस्से पर लगाने की लोक-परंपरा है (आँख से दूर रखें)।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, सूखी व अच्छी निकासी वाली मिट्टी। ज़्यादा पानी और जलभराव से बचाएँ। बड़े गमले में भी 1–2 साल में फल देता है। फरवरी–मार्च या बरसात के बाद लगाएँ।

सावधानी: पत्तों और कच्चे फल का दूध त्वचा में जलन कर सकता है।

अजवायन Ajwain (Carom)

Trachyspermum ammi · Apiaceae (अजमोद कुल)

संस्कृत: यवानी, दीप्यक

मसालेNursery में उपलब्ध

अजवायन लगभग 60–90 सेंटीमीटर ऊँचा, सौंफ जैसा दिखने वाला सालाना पौधा है। इसकी सफ़ेद छतरीनुमा फूलों की गुच्छियों में छोटे, भूरे, तेज़ खुशबू वाले बीज बनते हैं, जिनमें थाइमॉल नाम का तेल होता है। रसोई और आयुर्वेद दोनों में यह पेट की सबसे भरोसेमंद औषधियों में गिनी जाती है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
बीज (फल), पूरा पौधा
आयुर्वेदिक गुण
रस: कटु, तिक्त · गुण: लघु, रूक्ष, तीक्ष्ण · तासीर: गर्म · विपाक: कटु
दोषों पर असर
कफ और वात को शांत करती है, पित्त बढ़ा सकती है।

पारंपरिक उपयोग

  • भारी भोजन के बाद गैस, पेट फूलना और अपच में अजवायन को काले नमक के साथ लेने की घरेलू परंपरा है।
  • सर्दी-ज़ुकाम और बंद नाक में अजवायन की पोटली गरम करके सूँघी या सेंकी जाती है।
  • बच्चे के जन्म के बाद माँ को अजवायन का पानी और लड्डू देने का रिवाज़ बिहार-यूपी में आम है।
  • पूड़ी, पराठा, पकौड़ी और अचार में डालने से खाना सुपाच्य बनता है।
  • आयुर्वेद में यह दीपन (भूख बढ़ाने वाली), पाचन और शूलहर (दर्द कम करने वाली) मानी गई है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

अक्टूबर–नवंबर में बीज बोएँ; मार्च–अप्रैल तक बीज पक जाते हैं। धूप वाली जगह, हल्की भुरभुरी मिट्टी और कम पानी चाहिए। गमले में भी आसानी से उगती है। ध्यान दें: 'पत्ता अजवाइन' (मोटे पत्तों वाला पौधा) अलग पौधा है।

सावधानी: गर्म तासीर है, इसलिए गर्भावस्था, अल्सर या ज़्यादा पित्त (जलन, एसिडिटी) में अधिक मात्रा न लें।

अनार

अनार Pomegranate

Punica granatum · Lythraceae

संस्कृत: दाडिम

फलदारNursery में उपलब्ध

अनार 3–5 मीटर ऊँचा झाड़ीनुमा पेड़ है, जिसके लाल-नारंगी फूल और लाल दानों वाले फल होते हैं। आयुर्वेद में मीठे अनार को हृदय के लिए हितकारी और कमज़ोरी दूर करने वाला फल माना गया है। इसके फल का छिलका और फूल भी दवा में काम आते हैं।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल, दाने, छिलका, फूल, छाल, जड़
आयुर्वेदिक गुण
रस: मधुर, कषाय, अम्ल · गुण: लघु, स्निग्ध · तासीर: सामान्य (न ज़्यादा गर्म, न ठंडी)
दोषों पर असर
मीठा अनार तीनों दोषों को संतुलित करता है; खट्टा अनार वात-कफ शामक है।

पारंपरिक उपयोग

  • अनार का रस बीमारी के बाद कमज़ोरी, खून की कमी और भूख न लगने में दिया जाता है।
  • सूखे छिलके का काढ़ा दस्त और पेचिश में पारंपरिक रूप से इस्तेमाल होता है, क्योंकि यह कसैला (ग्राही) है।
  • छिलके का चूर्ण मसूड़ों और मुँह के छालों पर मंजन की तरह लगाया जाता है।
  • अनारदाना (सूखे खट्टे दाने) चटनी और चूर्ण में पाचन के लिए डाला जाता है।
  • फूलों का रस नाक से खून आने (नकसीर) में लोक-परंपरा में दिया जाता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप और अच्छी निकासी वाली मिट्टी चाहिए। बिहार में फरवरी–मार्च या जुलाई–अगस्त में लगाएँ। पानी नियमित पर कम दें; फल बनते समय पानी की अनियमितता से फल फटते हैं। बड़े गमले में भी फल देता है।

सावधानी: छाल और जड़ का काढ़ा तेज़ असर वाला है, इसे वैद्य की सलाह के बिना न लें।

किस्में: Anar Bhagwa ₹150 · Anar Bedana ₹150

अपराजिता

अपराजिता Aparajita (Butterfly Pea)

Clitoria ternatea · Fabaceae (शिम्बी कुल)

संस्कृत: अपराजिता, विष्णुक्रान्ता, गिरिकर्णी

लता / बेलNursery में उपलब्ध

अपराजिता एक पतली, तेज़ी से बढ़ने वाली बेल है, जिस पर गहरे नीले (कभी सफ़ेद) शंख जैसे फूल लगते हैं। पूजा में नीले फूल भगवान विष्णु और शनिदेव को चढ़ाए जाते हैं। आयुर्वेद में इसे मेध्य (बुद्धि बढ़ाने वाली) औषधियों में गिना जाता है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
जड़, बीज, पत्ते, फूल
आयुर्वेदिक गुण
रस: तिक्त, कषाय · गुण: लघु, रूक्ष · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
तीनों दोषों को शांत करने वाली मानी जाती है।

पारंपरिक उपयोग

  • जड़ और पत्तों को आयुर्वेद में याददाश्त और मानसिक शांति के लिए (मेध्य रसायन) उपयोग किया गया है।
  • नीले फूलों से बनी 'ब्लू टी' आजकल लोकप्रिय है; नींबू डालने पर इसका रंग बैंगनी हो जाता है।
  • जड़ का लेप सूजन और गले की ख़राश में पारंपरिक रूप से लगाया जाता है।
  • बीज तेज़ जुलाब (विरेचन) का काम करते हैं, इसलिए केवल वैद्य की देखरेख में।
  • फलीदार पौधा होने से मिट्टी में नाइट्रोजन बढ़ाता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

जाली, बाड़ या खिड़की की ग्रिल पर आसानी से चढ़ती है। धूप या हल्की छाँव, सामान्य पानी। बरसात में बीज या पौधा लगाएँ; गर्मी से सर्दी तक फूल देती है।

सावधानी: बीज जुलाब वाले हैं; गर्भावस्था में अंदरूनी सेवन न करें।

अमड़ा

अमड़ा Amra (Hog Plum)

Spondias pinnata / Spondias dulcis · Anacardiaceae (आम्र कुल)

संस्कृत: आम्रातक

फलदारNursery में उपलब्ध

अमड़ा (आम्रातक) आम परिवार का पेड़ है, जिसके हरे-पीले खट्टे फल अचार, चटनी और सब्ज़ी में बहुत पसंद किए जाते हैं। बिहार-बंगाल में अमड़े की खट्टी-मीठी चटनी हर घर की पहचान है। हाइब्रिड अमड़ा कम ऊँचाई पर जल्दी फल देता है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल, छाल, पत्ते
आयुर्वेदिक गुण
रस: अम्ल, कषाय (कच्चा फल), पका फल मधुर-अम्ल · तासीर: गर्म (कच्चा फल)
दोषों पर असर
वात को शांत करता है; कच्चा फल ज़्यादा खाने पर पित्त बढ़ा सकता है।

पारंपरिक उपयोग

  • कच्चे फल का अचार और चटनी भूख बढ़ाने और पाचन के लिए खाई जाती है।
  • फल विटामिन C से भरपूर है; पारंपरिक रूप से स्कर्वी (मसूड़ों से खून) में उपयोगी माना गया।
  • छाल का काढ़ा दस्त और पेचिश में लोक-चिकित्सा में दिया जाता है।
  • पत्तों का रस कान के दर्द में लोक-परंपरा में डाला जाता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, सामान्य मिट्टी। बरसात (जून–अगस्त) में लगाना सबसे अच्छा। हाइब्रिड अमड़ा बड़े गमले में भी 1–2 साल में फल देने लगता है।

अमरबेल

अमरबेल Amarbel (Dodder)

Cuscuta reflexa · Convolvulaceae

संस्कृत: आकाशवल्ली, अमरवल्ली

लता / बेलNursery में उपलब्ध

अमरबेल बिना पत्ते और बिना जड़ वाली, पीले-सुनहरे धागों जैसी परजीवी बेल है, जो दूसरे पेड़ों पर लिपटकर उन्हीं का रस खींचकर जीती है। इसी कारण इसे 'आकाशवल्ली' कहा गया है। सर्दियों में इस पर छोटे सफ़ेद, खुशबूदार फूल आते हैं।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
पूरी बेल

पारंपरिक उपयोग

  • बेल को तेल में पकाकर बालों में लगाने की लोक-परंपरा है; माना जाता है कि यह बाल झड़ना और रूसी कम करता है।
  • आयुर्वेद में इसे पित्त और कफ के रोगों, खुजली और त्वचा रोगों में बाहरी व अंदरूनी प्रयोग के लिए बताया गया है।
  • बेल का रस पीलिया में लोक-चिकित्सा में दिया जाता है, पर यह केवल अनुभवी वैद्य की देखरेख में ही करें।
  • इसके बीज भी आयुर्वेदिक योगों में काम आते हैं।

कैसे लगाएँ और देखभाल

यह परजीवी है, इसे मिट्टी में नहीं उगाया जाता; किसी पुराने बेर, मेहंदी या बाड़ के पौधे पर डाल दें। अपने फल या सब्ज़ी के बगीचे से दूर रखें, वरना उन्हें सुखा देगी।

सावधानी: गर्भावस्था में न लें। बगीचे में तेज़ी से फैलकर दूसरे पौधों को नुकसान पहुँचाती है।

अमरूद

अमरूद Guava

Psidium guajava · Myrtaceae (जम्बू कुल)

संस्कृत: पेरुक, दृढ़बीज

फलदारNursery में उपलब्ध

अमरूद बिहार का सबसे आम और सस्ता पौष्टिक फल है। इसमें संतरे से कई गुना ज़्यादा विटामिन C और भरपूर रेशा (फाइबर) होता है। पुराने आयुर्वेद ग्रंथों में यह नहीं है, पर लोक-चिकित्सा में इसके पत्ते बहुत काम आते हैं।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल, पत्ते, छाल

पारंपरिक उपयोग

  • कोमल पत्ते चबाने या पत्तों के काढ़े से कुल्ला करने से मुँह के छाले और मसूड़ों की सूजन में आराम मिलता है।
  • पत्तों का काढ़ा दस्त में लोक-परंपरा में दिया जाता है, क्योंकि यह कसैला है।
  • पका फल कब्ज़ में फायदेमंद है; रेशा आँतों को साफ़ रखता है।
  • भुना हुआ अमरूद खाँसी-ज़ुकाम में देहात में दिया जाता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, किसी भी मिट्टी में आसानी से फलता है। बरसात या फरवरी–मार्च में लगाएँ। इलाहाबादी सफ़ेदा, ललित और ताइवान पिंक जैसी किस्में गमले में भी फल देती हैं।

सावधानी: खाली पेट बहुत ज़्यादा अमरूद खाने से कुछ लोगों को गैस होती है।

किस्में: Guava Allahabad Safeda ₹75 · Guava Lalit ₹75 · Guava Taiwan Pink ₹75 · Guava L-49 (Sardar) ₹75

अमलतास

अमलतास Amaltas (Golden Shower)

Cassia fistula · Fabaceae (शिम्बी कुल)

संस्कृत: आरग्वध, राजवृक्ष, कृतमाल

वृक्षNursery में उपलब्ध

गर्मी में जब यह पेड़ पीले फूलों के लंबे गुच्छों से भर जाता है तो इसे 'गोल्डन शावर' कहते हैं। इसकी लंबी, काली, बेलन जैसी फलियों में मीठा काला गूदा होता है। आयुर्वेद में इसे सबसे सौम्य और सुरक्षित जुलाब (मृदु विरेचन) माना गया है, जो बच्चों और बूढ़ों को भी दिया जाता था।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल का गूदा, पत्ते, फूल, छाल, जड़
आयुर्वेदिक गुण
रस: मधुर · गुण: गुरु, मृदु, स्निग्ध · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
वात और पित्त को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • फली का गूदा कब्ज़ में हल्के जुलाब की तरह पारंपरिक रूप से दिया जाता है।
  • आयुर्वेद में इसे 'कुष्ठघ्न' कहा गया है; पत्तों का लेप दाद, खुजली और त्वचा रोगों में लगाया जाता है।
  • गूदे को गुनगुने पानी में घोलकर गरारे करने से गले की ख़राश में आराम मिलता है।
  • सड़क किनारे और पार्क में छायादार व सुंदर पेड़ के रूप में लगाया जाता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, सूखा सहन कर लेता है। बरसात में लगाएँ। 4–5 साल में फूल देने लगता है; मई–जून में खिलता है।

सावधानी: ज़्यादा मात्रा में पेट में मरोड़ और दस्त हो सकते हैं; गर्भावस्था में न लें।

अर्क (मदार / अकौन) Madar (Aak)

Calotropis gigantea / C. procera · Apocynaceae (अर्क कुल)

संस्कृत: अर्क, अलर्क, मन्दार

जड़ी-बूटी⚠ ज़हरीला / सावधानीNursery में उपलब्ध

मदार (आक, अकौन) मोटे, भूरे-हरे, मखमली पत्तों वाली झाड़ी है, जो सूखी, बंजर ज़मीन पर भी उग जाती है। इसके बैंगनी या सफ़ेद, मुकुट जैसे फूल शिवजी को बहुत प्रिय हैं। पौधा तोड़ने पर गाढ़ा सफ़ेद दूध निकलता है, जो तेज़ और ज़हरीला होता है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
पत्ते, फूल, जड़ की छाल, दूध (केवल चिकित्सक की देखरेख में)
आयुर्वेदिक गुण
रस: कटु, तिक्त · गुण: लघु, रूक्ष, तीक्ष्ण · तासीर: गर्म
दोषों पर असर
कफ और वात को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • गरम किए हुए पत्ते पर सरसों का तेल लगाकर जोड़ों के दर्द और सूजन पर बाँधने की लोक-परंपरा है।
  • फूल और पत्ते शिव पूजा, विशेषकर सावन और महाशिवरात्रि में चढ़ाए जाते हैं।
  • आयुर्वेद में शोधित जड़-छाल का प्रयोग खाँसी-दमा और त्वचा रोगों के योगों में, केवल वैद्य द्वारा किया जाता है।
  • सफ़ेद मदार (श्वेतार्क) की जड़ को पूजा में विशेष माना जाता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, सूखी, रेतीली ज़मीन; पानी बहुत कम। किसी भी मौसम में बीज या पौधे से लग जाता है। पूजा के लिए घर के बाहर, बच्चों की पहुँच से दूर लगाएँ।

सावधानी: ज़हरीला पौधा। इसका दूध आँख में जाने पर अंधापन तक हो सकता है; खाने पर जान का ख़तरा है। अंदरूनी सेवन कभी ख़ुद न करें।

अर्जुन

अर्जुन Arjun

Terminalia arjuna · Combretaceae (हरीतकी कुल)

संस्कृत: अर्जुन, ककुभ, पार्थ

वृक्षNursery में उपलब्ध

अर्जुन नदियों-नालों के किनारे उगने वाला 20–25 मीटर ऊँचा सदाबहार जैसा पेड़ है, जिसकी छाल चिकनी, सफ़ेद-भूरी होती है और परतों में उतरती है। आयुर्वेद में इसकी छाल को हृदय के लिए सबसे प्रसिद्ध औषधि (हृद्य) माना गया है। अर्जुनारिष्ट और अर्जुन क्षीरपाक इसी से बनते हैं।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
छाल (मुख्य), पत्ते, फल
आयुर्वेदिक गुण
रस: कषाय · गुण: लघु, रूक्ष · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
कफ और पित्त को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • छाल को दूध में पकाकर (अर्जुन क्षीरपाक / अर्जुन की चाय) हृदय को बल देने के लिए परंपरा से लिया जाता है।
  • आयुर्वेद में इसे 'संधानीय' कहा गया है, यानी टूटी हड्डी जोड़ने और चोट भरने में सहायक।
  • कसैली छाल का काढ़ा दस्त, खून बहने और घाव धोने में प्रयोग होता है।
  • पेड़ मिट्टी कटाव रोकने और नदी किनारे लगाने के लिए बहुत उपयोगी है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, नम मिट्टी पसंद करता है, पर सामान्य ज़मीन पर भी उगता है। बरसात में लगाएँ। तेज़ी से बढ़ता है; छाल 8–10 साल के पेड़ से ही ली जाती है।

सावधानी: हृदय की बीमारी में अर्जुन लें तो भी डॉक्टर की दवा बंद न करें; पहले डॉक्टर से बात करें।

अशोक

अशोक Ashok (Sita Ashok)

Saraca asoca · Fabaceae (शिम्बी कुल)

संस्कृत: अशोक, हेमपुष्प, वञ्जुल

वृक्षNursery में उपलब्ध

असली अशोक (सीता अशोक) एक मध्यम आकार का सदाबहार पेड़ है, जिस पर फरवरी–अप्रैल में नारंगी-लाल फूलों के घने गुच्छे लगते हैं। रामायण में सीता जी अशोक वाटिका में इसी पेड़ के नीचे रही थीं। आयुर्वेद में यह स्त्रियों के रोगों की प्रमुख औषधि है; अशोकारिष्ट इसी की छाल से बनता है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
छाल (मुख्य), फूल, बीज
आयुर्वेदिक गुण
रस: कषाय, तिक्त · गुण: लघु, रूक्ष · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
कफ और पित्त को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • छाल का प्रयोग आयुर्वेद में मासिक धर्म की अनियमितता, ज़्यादा रक्तस्राव और पेट दर्द में किया जाता है।
  • कसैली छाल का काढ़ा खूनी बवासीर और दस्त में पारंपरिक रूप से दिया जाता है।
  • फूल पूजा में चढ़ाए जाते हैं; चैत्र में 'अशोकाष्टमी' पर इसकी कलियाँ खाने की परंपरा है।
  • घर-मंदिर के पास शुभ और छायादार पेड़ के रूप में लगाया जाता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

हल्की छाँव से धूप, नम उपजाऊ मिट्टी और नियमित पानी पसंद करता है। धीरे बढ़ता है। बरसात में लगाएँ। ध्यान दें: सड़क किनारे लगने वाला लंबा, पतला 'अशोक' (Polyalthia) दवा वाला अशोक नहीं है।

सावधानी: दवा के लिए केवल सीता अशोक की छाल ही लें; गर्भावस्था में वैद्य से पूछे बिना न लें।

अश्वगंधा

अश्वगंधा Ashwagandha

Withania somnifera · Solanaceae (कंटकारी कुल)

संस्कृत: अश्वगंधा, वाजिगंधा, बलदा

जड़ी-बूटीNursery में उपलब्ध

अश्वगंधा 1–1.5 मीटर की झाड़ीनुमा जड़ी है, जिसके छोटे हरे-पीले फूल और नारंगी-लाल बेरी जैसे फल पत्तों जैसे आवरण में ढके रहते हैं। ताज़ी जड़ से घोड़े जैसी गंध आती है, इसीलिए नाम 'अश्वगंधा' है। आयुर्वेद में यह सबसे प्रसिद्ध रसायन (शक्ति और आयु बढ़ाने वाली) औषधि है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
जड़ (मुख्य), पत्ते, बीज
आयुर्वेदिक गुण
रस: तिक्त, कषाय, मधुर · गुण: लघु, स्निग्ध · तासीर: गर्म
दोषों पर असर
कफ और वात को शांत करती है।

पारंपरिक उपयोग

  • जड़ का चूर्ण दूध के साथ कमज़ोरी, थकान और दुबलेपन में बल बढ़ाने के लिए परंपरा से लिया जाता है।
  • तनाव, बेचैनी और अच्छी नींद के लिए इसका प्रयोग आयुर्वेद और आधुनिक शोध दोनों में चर्चित है।
  • वात रोगों, जोड़ों के दर्द और कमर दर्द में इसके तेल और चूर्ण का प्रयोग होता है।
  • पत्तों का लेप सूजन और फोड़े-फुंसी पर लगाया जाता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

सूखी, रेतीली, अच्छी निकासी वाली मिट्टी और पूरी धूप चाहिए; ज़्यादा पानी से जड़ सड़ती है। बरसात के अंत (अगस्त–सितंबर) में बोएँ; 5–6 महीने में जड़ तैयार होती है।

सावधानी: गर्भावस्था में न लें। थायरॉइड, शुगर या नींद की दवा ले रहे हों तो डॉक्टर से पूछकर ही लें।

आँवला

आँवला Amla

Phyllanthus emblica · Phyllanthaceae

संस्कृत: आमलकी, धात्री, अमृतफल

फलदारNursery में उपलब्ध

आँवला आयुर्वेद का सबसे प्रसिद्ध रसायन फल है — च्यवनप्राश और त्रिफला दोनों का मुख्य घटक। एक आँवले में कई संतरों जितना विटामिन C होता है, जो पकाने-सुखाने पर भी काफ़ी हद तक बचा रहता है। कार्तिक में आँवला नवमी पर इस पेड़ की पूजा और इसके नीचे भोजन करने की परंपरा है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल (मुख्य), बीज, पत्ते, छाल
आयुर्वेदिक गुण
रस: पाँचों (लवण को छोड़कर), मुख्य रूप से अम्ल · गुण: गुरु, रूक्ष · तासीर: ठंडी · विपाक: मधुर
दोषों पर असर
तीनों दोषों को शांत करता है, विशेषकर पित्त।

पारंपरिक उपयोग

  • रोज़ एक आँवला, मुरब्बा या रस रोग-प्रतिरोधक क्षमता और पाचन के लिए पारंपरिक रूप से लिया जाता है।
  • बालों का झड़ना और समय से पहले सफ़ेद होना रोकने के लिए आँवला तेल और चूर्ण का प्रयोग होता है।
  • आँखों की रोशनी और त्वचा की चमक के लिए आयुर्वेद में इसे सर्वोत्तम माना गया है।
  • एसिडिटी और पेट की जलन में आँवला चूर्ण दिया जाता है।
  • त्रिफला (आँवला, हरड़, बहेड़ा) कब्ज़ और पेट साफ़ करने का प्रसिद्ध योग है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, किसी भी मिट्टी में — खारी और सूखी ज़मीन भी चलती है। बरसात में लगाएँ। NA-7, कंचन जैसी कलमी किस्में 3–4 साल में फल देती हैं; अच्छे फल के लिए दो किस्में पास-पास लगाएँ।

सावधानी: बहुत ठंडा होने से सर्दी-ज़ुकाम की प्रवृत्ति वाले लोग रात को आँवला न लें।

आम

आम Mango

Mangifera indica · Anacardiaceae (आम्र कुल)

संस्कृत: आम्र, रसाल, सहकार

फलदारNursery में उपलब्ध

आम को 'फलों का राजा' कहा जाता है और बिहार के मालदह, जर्दालु, लंगड़ा जैसे आम पूरे देश में मशहूर हैं। आयुर्वेद में पका आम पौष्टिक, बलवर्धक और वात-नाशक बताया गया है। इसके पत्ते हर शुभ काम में तोरण बनाकर लगाए जाते हैं।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल (कच्चा व पका), गुठली, पत्ते, छाल, बौर
आयुर्वेदिक गुण
पका फल — रस: मधुर · गुण: गुरु, स्निग्ध · तासीर: ठंडी; कच्चा फल — अम्ल, कषाय, तासीर गर्म
दोषों पर असर
पका आम वात शांत करता है और बल बढ़ाता है; कच्चा आम ज़्यादा खाने पर पित्त बढ़ाता है।

पारंपरिक उपयोग

  • गर्मी में लू से बचाव के लिए कच्चे आम का पना पिया जाता है।
  • पका आम दुबलेपन और कमज़ोरी में पौष्टिक आहार है; आयुर्वेद इसे दूध के साथ लेने की सलाह देता है।
  • गुठली (आम की गिरी) का चूर्ण दस्त और पेचिश में पारंपरिक रूप से दिया जाता है।
  • कोमल पत्तों का काढ़ा और छाल लोक-चिकित्सा में मुँह के छालों और दस्त में उपयोग होते हैं।
  • पत्ते और लकड़ी पूजा, हवन और विवाह के मंडप में शुभ माने जाते हैं।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप और गहरी मिट्टी चाहिए। बरसात (जुलाई–अगस्त) में कलमी पौधा लगाएँ। आम्रपाली, मल्लिका जैसी बौनी किस्में बड़े गमले या छोटे आँगन में भी फल देती हैं।

सावधानी: कच्चा आम ज़्यादा खाने से गले में ख़राश, दस्त और फोड़े-फुंसी हो सकते हैं।

किस्में: Mango Langra ₹250 · Mango Dudhiya Malda ₹250 · Mango Amrapali ₹165 · Mango Mallika ₹185 · Mango Gulab Khas ₹250 · Mango Chausa ₹250 · Mango Bombaiya ₹250 · Mango Dashehari ₹185 · Mango Kishan Bhog ₹185

इमली

इमली Tamarind

Tamarindus indica · Fabaceae (शिम्बी कुल)

संस्कृत: अम्लिका, चिञ्चा

वृक्षNursery में उपलब्ध

इमली 20–25 मीटर ऊँचा, सैकड़ों साल जीने वाला घना छायादार पेड़ है। इसकी भूरी फलियों का खट्टा-मीठा गूदा चटनी, साँभर और गोलगप्पे के पानी की जान है। पकी इमली आयुर्वेद में भूख बढ़ाने वाली और हल्की दस्तावर मानी गई है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल का गूदा, पत्ते, फूल, बीज, छाल
आयुर्वेदिक गुण
रस: अम्ल · गुण: गुरु · तासीर: गर्म (कच्ची); पकी इमली मधुर-अम्ल
दोषों पर असर
वात को शांत करती है; कच्ची इमली ज़्यादा खाने पर कफ-पित्त बढ़ाती है।

पारंपरिक उपयोग

  • पकी इमली का पना गर्मी और लू में शरीर को ठंडक और ताज़गी देने के लिए पिया जाता है।
  • गूदा भूख बढ़ाने और कब्ज़ में हल्के जुलाब की तरह पारंपरिक रूप से लिया जाता है।
  • पत्तों का काढ़ा सूजन और मोच पर सेंक के रूप में लगाया जाता है।
  • बीजों का चूर्ण लोक-परंपरा में जोड़ों के दर्द में उपयोग होता है।
  • पीतल-ताँबे के बर्तन चमकाने में भी इमली का प्रयोग होता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, सूखा सहन करती है, किसी भी मिट्टी में उग जाती है। बरसात में लगाएँ। बीज वाला पेड़ 8–10 साल में और कलमी 4–5 साल में फल देता है।

सावधानी: दाँतों के इनेमल, एसिडिटी और जोड़ों की सूजन में ज़्यादा कच्ची इमली न खाएँ।

इलायची

इलायची Cardamom

Elettaria cardamomum · Zingiberaceae (आर्द्रक कुल)

संस्कृत: एला, सूक्ष्मैला

मसालेNursery में उपलब्ध

छोटी इलायची अदरक परिवार का 2–3 मीटर ऊँचा पौधा है, जिसके लंबे पत्ते जड़ के गुच्छे से निकलते हैं और फल ज़मीन के पास लगते हैं। इसे 'मसालों की रानी' कहा जाता है। मुँह की दुर्गंध, उल्टी और पाचन में यह सबसे सौम्य औषधि मानी गई है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल (दाने), बीज
आयुर्वेदिक गुण
रस: कटु, मधुर · गुण: लघु, रूक्ष · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
तीनों दोषों को संतुलित करती है, विशेषकर कफ और वात।

पारंपरिक उपयोग

  • इलायची के दाने चबाने से मुँह की दुर्गंध दूर होती है और भोजन के बाद ताज़गी आती है।
  • सफ़र में जी मिचलाने और उल्टी में इलायची चूसने की घरेलू परंपरा है।
  • चाय, खीर और मिठाई में डालने से गैस और भारीपन कम होता है।
  • खाँसी और गले की ख़राश में इलायची को मिश्री के साथ लिया जाता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

यह छाँव, नमी और ठंडक पसंद करने वाला पौधा है; बिहार में तेज़ धूप और लू से बचाकर, आधी छाँव में बड़े गमले में रखें और मिट्टी हमेशा नम रखें। सजावटी और पत्तों के लिए अच्छा है; मैदानी इलाके में फल कम ही आते हैं।

सावधानी: पथरी (गॉल स्टोन) वाले लोग अधिक मात्रा न लें।

कचनार

कचनार Kachnar

Bauhinia variegata · Fabaceae (शिम्बी कुल)

संस्कृत: काञ्चनार, कोविदार

वृक्षNursery में उपलब्ध

कचनार के पत्ते ऊँट के खुर या तितली के पंख जैसे दो भागों में बँटे होते हैं और बसंत में इस पर गुलाबी-बैंगनी या सफ़ेद, ऑर्किड जैसे सुंदर फूल आते हैं। इसकी कलियों की सब्ज़ी और रायता उत्तर भारत में बहुत पसंद है। आयुर्वेद का प्रसिद्ध 'काञ्चनार गुग्गुलु' इसी की छाल से बनता है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
छाल (मुख्य), फूल की कलियाँ, पत्ते
आयुर्वेदिक गुण
रस: कषाय · गुण: लघु, रूक्ष · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
कफ और पित्त को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • आयुर्वेद में छाल का प्रयोग गाँठ, गिल्टी और गले की सूजन (गण्डमाला) में किया जाता है।
  • कसैली छाल का काढ़ा दस्त, खूनी बवासीर और मुँह के छालों में कुल्ले के रूप में।
  • कलियों की सब्ज़ी और अचार स्वादिष्ट और रेशेदार भोजन है।
  • सड़क किनारे और बगीचे में बसंत के फूलों के लिए सुंदर पेड़।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, सामान्य मिट्टी; सूखा सह लेता है। बरसात में लगाएँ; 3–4 साल में फूल देने लगता है।

किस्में: Kachnar ₹110 · Kachnar (White) ₹110

कटहल

कटहल Jackfruit

Artocarpus heterophyllus · Moraceae (वट कुल)

संस्कृत: पनस

फलदारNursery में उपलब्ध

कटहल दुनिया का सबसे बड़ा पेड़ पर लगने वाला फल है और बिहार के लगभग हर गाँव में मिलता है। कच्चा कटहल 'शाकाहारी मीट' की तरह सब्ज़ी में और पका कटहल मीठे फल के रूप में खाया जाता है। आयुर्वेद में इसे पौष्टिक पर भारी (देर से पचने वाला) बताया गया है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल (कच्चा व पका), बीज, पत्ते, लकड़ी
आयुर्वेदिक गुण
रस: मधुर, कषाय · गुण: गुरु, स्निग्ध · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
वात और पित्त को शांत करता है, कफ बढ़ाता है।

पारंपरिक उपयोग

  • कच्चे कटहल की सब्ज़ी और अचार रेशे और ऊर्जा का अच्छा स्रोत हैं।
  • भुने हुए बीज प्रोटीन वाले नाश्ते के रूप में खाए जाते हैं।
  • पत्तों का काढ़ा लोक-चिकित्सा में मुँह के छालों और त्वचा पर फोड़ों में प्रयोग होता है।
  • पीली, मज़बूत लकड़ी फर्नीचर और वाद्य-यंत्रों में काम आती है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, गहरी मिट्टी, जलभराव से बचाएँ। बरसात में लगाएँ। कलमी पौधा 3–4 साल में फल देता है।

सावधानी: पका कटहल भारी है; खाने के तुरंत बाद पान या पानी ज़्यादा न लें, अपच हो सकता है।

कदम्ब

कदम्ब Kadamb

Neolamarckia cadamba · Rubiaceae

संस्कृत: कदम्ब, नीप, हलिप्रिय

वृक्षNursery में उपलब्ध

कदम्ब तेज़ी से बढ़ने वाला ऊँचा पेड़ है, जिस पर बरसात में गेंद जैसे गोल, नारंगी-पीले, खुशबूदार फूल लगते हैं। भगवान कृष्ण की लीलाओं से जुड़ा होने के कारण यह मंदिरों और तालाबों के किनारे शुभ माना जाता है। इसकी छाल और पत्ते आयुर्वेद में बुखार और घाव में उपयोग होते हैं।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
छाल, पत्ते, फल, फूल
आयुर्वेदिक गुण
रस: तिक्त, कषाय, मधुर · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
कफ और पित्त को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • छाल का काढ़ा बुखार और कमज़ोरी में लोक-परंपरा में दिया जाता है।
  • पत्तों का लेप घाव, सूजन और फोड़ों पर लगाया जाता है।
  • फलों का रस और फूल पित्त की जलन में ठंडक के लिए उपयोग होते हैं।
  • छायादार पेड़ और पक्षियों के आश्रय के लिए बहुत अच्छा है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, नम मिट्टी; बहुत तेज़ बढ़ता है। बरसात में लगाएँ। 4–5 साल में फूलने लगता है।

कनेर (पीला)

कनेर (पीला) Yellow Kaner

Cascabela thevetia · Apocynaceae (करवीर कुल)

संस्कृत: पीत करवीर

फूल⚠ ज़हरीला / सावधानीNursery में उपलब्ध

पीला कनेर पतले, चमकीले पत्तों वाली झाड़ी है, जिस पर लगभग सालभर घंटी जैसे पीले फूल खिलते हैं। फूल शिवजी की पूजा में चढ़ाए जाते हैं। यह पौधा सुंदर है, पर इसके हर भाग में तेज़ ज़हर (कार्डियक ग्लाइकोसाइड) होता है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
केवल बाहरी उपयोग — पत्ते, छाल (चिकित्सक की देखरेख में)

पारंपरिक उपयोग

  • फूल पूजा और माला में उपयोग होते हैं।
  • पुराने ग्रंथों में इसकी छाल-पत्तों का लेप केवल बाहरी रूप से त्वचा रोगों में बताया गया है, और वह भी शुद्धि के बाद, वैद्य की देखरेख में।
  • सड़क किनारे और बाड़ में सजावट के लिए, क्योंकि जानवर इसे नहीं खाते।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, बहुत कम देखभाल, सूखा सह लेता है। किसी भी मौसम में लगा सकते हैं।

सावधानी: ज़हरीला पौधा। बीज, पत्ते, दूध (रस) — कुछ भी खाने से जान को ख़तरा है। बच्चों और पशुओं की पहुँच से दूर लगाएँ; छँटाई के बाद हाथ धोएँ।

कपास Cotton (Kapas)

Gossypium herbaceum · Malvaceae (कार्पास कुल)

संस्कृत: कार्पास, तुण्डिकेरी

जड़ी-बूटीNursery में उपलब्ध

कपास वह पौधा है जिसकी रुई से हमारे कपड़े बनते हैं। इसके पीले-सफ़ेद फूल बाद में गुलाबी हो जाते हैं और फल (टिंडा) फटने पर सफ़ेद रुई निकलती है। आयुर्वेद में इसके बीज (बिनौला) पौष्टिक और दूध बढ़ाने वाले, और जड़ स्त्री रोगों में उपयोगी बताई गई है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
बीज (बिनौला), जड़, पत्ते, फूल, रुई
आयुर्वेदिक गुण
रस: मधुर · तासीर: गर्म (बीज)
दोषों पर असर
वात को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • बिनौला पशुओं को दूध बढ़ाने के लिए खिलाया जाता है; परंपरा में प्रसूता को भी दूध बढ़ाने के लिए दिया जाता था।
  • पत्तों का रस और लेप लोक-परंपरा में जलने और घाव पर लगाया जाता है।
  • कच्ची रुई घाव पर पट्टी और दीये की बत्ती के लिए काम आती है।
  • बच्चों को पौधे से रुई बनते दिखाने के लिए स्कूल और घर के बगीचे में अच्छा पौधा।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, गर्मी पसंद है। मई–जून में बोएँ; अक्टूबर–दिसंबर में टिंडे खुलते हैं। गमले में भी उगता है; ज़्यादा पानी न दें।

सावधानी: जड़ की छाल गर्भाशय पर असर करती है; गर्भावस्था में अंदरूनी सेवन बिल्कुल न करें। कच्चा बिनौला इंसानों के लिए नहीं है।

कपूर

कपूर Camphor Tree

Cinnamomum camphora · Lauraceae (कर्पूर कुल)

संस्कृत: कर्पूर, घनसार, हिमवालुका

वृक्ष⚠ ज़हरीला / सावधानीNursery में उपलब्ध

कपूर का पेड़ चमकीले पत्तों वाला सदाबहार पेड़ है, जिसके पत्ते मसलने पर कपूर की तेज़ खुशबू आती है। पारंपरिक 'भीमसेनी' कपूर इसी परिवार के पेड़ों से बनता है; बाज़ार की कपूर की टिकिया ज़्यादातर रसायन से बनती है। पूजा-आरती में कपूर का बहुत महत्व है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
पत्ते, लकड़ी (इनसे कपूर निकाला जाता है)
आयुर्वेदिक गुण
रस: तिक्त, कटु, मधुर · गुण: लघु, तीक्ष्ण · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
कफ और पित्त को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • कपूर को नारियल तेल में मिलाकर छाती पर मलने से बंद नाक और जकड़न में आराम मिलता है।
  • जोड़ों और मांसपेशियों के दर्द के तेलों और बाम में कपूर डाला जाता है।
  • खुजली और त्वचा की जलन पर कपूर मिला तेल ठंडक देता है।
  • कपड़ों और अनाज में कीड़े भगाने और आरती में जलाने के काम आता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

धूप या हल्की छाँव, अच्छी निकासी वाली मिट्टी। बरसात में लगाएँ। धीरे बढ़ता है; पत्ते तोड़कर खुशबू के लिए आँगन में लगा सकते हैं।

सावधानी: कपूर खाने की चीज़ नहीं है — थोड़ी मात्रा भी बच्चों में दौरे (मिर्गी जैसे झटके) ला सकती है। छोटे बच्चों की नाक के पास कपूर न लगाएँ।

कमरख

कमरख Kamrakh (Star Fruit)

Averrhoa carambola · Oxalidaceae

संस्कृत: कर्मरङ्ग

फलदारNursery में उपलब्ध

कमरख का पीला-हरा फल काटने पर तारे जैसा दिखता है, इसलिए इसे 'स्टार फ्रूट' कहते हैं। बिहार-बंगाल में इसकी खट्टी चटनी और अचार बहुत पसंद किए जाते हैं। पेड़ छोटा, सजावटी और साल में दो-तीन बार फल देने वाला है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल, पत्ते
आयुर्वेदिक गुण
रस: अम्ल · तासीर: गर्म
दोषों पर असर
वात को शांत करता है, पित्त बढ़ा सकता है।

पारंपरिक उपयोग

  • फल भूख बढ़ाने और पाचन के लिए चटनी-अचार के रूप में खाया जाता है।
  • विटामिन C का अच्छा स्रोत है।
  • पके फल का रस गर्मी में प्यास बुझाने के लिए पिया जाता है।
  • लोक-परंपरा में पत्तों का लेप खुजली और दाद पर लगाया जाता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

धूप या हल्की छाँव, नम पर अच्छी निकासी वाली मिट्टी। बरसात में लगाएँ। बड़े गमले में भी फल देता है।

सावधानी: किडनी (गुर्दे) के मरीज़ कमरख बिल्कुल न खाएँ — इसमें ऐसा तत्व है जो उनके लिए ख़तरनाक हो सकता है। ज़्यादा ऑक्सालेट के कारण पथरी वाले भी बचें।

कमल Lotus

Nelumbo nucifera · Nelumbonaceae

संस्कृत: पद्म, कमल, अरविन्द, पुण्डरीक

फूलNursery में उपलब्ध

कमल भारत का राष्ट्रीय फूल है और देवी लक्ष्मी व सरस्वती का आसन माना जाता है। कीचड़ में उगकर भी साफ़ रहने के कारण यह पवित्रता का प्रतीक है। आयुर्वेद में इसके लगभग सभी भाग ठंडक देने वाले और पित्त-शामक बताए गए हैं।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फूल, केसर, बीज (मखाना नहीं, कमलगट्टा), कंद (कमल ककड़ी), पत्ते
आयुर्वेदिक गुण
रस: मधुर, तिक्त, कषाय · गुण: लघु, स्निग्ध · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
कफ और पित्त को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • फूल और पंखुड़ियों का शरबत गर्मी, जलन और ज़्यादा प्यास में ठंडक देता है।
  • कमलगट्टे (बीज) भूनकर या खीर में पौष्टिक आहार के रूप में खाए जाते हैं।
  • कमल ककड़ी (कंद) की सब्ज़ी और चिप्स बनते हैं।
  • केसर (पुंकेसर) आयुर्वेद में खून बहने वाले रोगों में उपयोग होता है।
  • पूजा, विशेषकर दीपावली में लक्ष्मी पूजा में कमल का विशेष महत्व है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

बिना छेद वाले बड़े टब या तालाब में, नीचे चिकनी मिट्टी और ऊपर 15–30 सेमी पानी रखें। पूरी धूप ज़रूरी है। फरवरी–अप्रैल में कंद लगाएँ; गर्मी-बरसात में फूलता है, सर्दी में आराम करता है।

करंज Karanj

Pongamia pinnata · Fabaceae (शिम्बी कुल)

संस्कृत: करञ्ज, नक्तमाल

वृक्ष⚠ ज़हरीला / सावधानीNursery में उपलब्ध

करंज चमकदार हरे पत्तों वाला मध्यम आकार का छायादार पेड़ है, जिस पर बसंत में हल्के गुलाबी-बैंगनी फूल आते हैं। इसके बीजों से निकलने वाला कड़वा तेल (करंज तेल) त्वचा रोगों और कीट-नाशक के रूप में प्रसिद्ध है। आयुर्वेद में इसे नीम की तरह 'कुष्ठघ्न' (त्वचा रोग नाशक) माना गया है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
बीज का तेल, छाल, पत्ते, टहनी (दातून)
आयुर्वेदिक गुण
रस: तिक्त, कटु, कषाय · तासीर: गर्म
दोषों पर असर
कफ और वात को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • करंज का तेल दाद, खाज, खुजली और फोड़ों पर बाहरी रूप से लगाया जाता है।
  • पत्तों का काढ़ा घाव धोने और सेंक में प्रयोग होता है।
  • टहनी से दातून करने की परंपरा है; यह मसूड़ों के लिए अच्छा माना जाता है।
  • करंज तेल और खली खेतों में जैविक कीटनाशक और खाद के रूप में काम आते हैं।
  • सड़क और खेत की मेड़ पर छाया व मिट्टी में नाइट्रोजन के लिए लगाया जाता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, किसी भी मिट्टी में — खारी और जलभराव वाली ज़मीन में भी। बरसात में लगाएँ; तेज़ी से बढ़ता है।

सावधानी: बीज और तेल ज़हरीले हैं, इन्हें खाएँ नहीं — केवल बाहरी प्रयोग।

करवीर (कनेर)

करवीर (कनेर) Oleander (Kaner)

Nerium oleander · Apocynaceae (करवीर कुल)

संस्कृत: करवीर, अश्वमारक, हयमार

फूल⚠ ज़हरीला / सावधानीNursery में उपलब्ध

करवीर (लाल, गुलाबी या सफ़ेद कनेर) पतले, लंबे, चमड़े जैसे पत्तों वाली सदाबहार झाड़ी है, जिस पर सालभर गुच्छों में फूल आते हैं। इसके संस्कृत नाम 'अश्वमारक' (घोड़े को मारने वाला) से ही पता चलता है कि यह कितना ज़हरीला है। सफ़ेद कनेर के फूल शिवजी को चढ़ाए जाते हैं।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
केवल बाहरी उपयोग — जड़ की छाल, पत्ते (वैद्य की देखरेख में)
आयुर्वेदिक गुण
रस: कटु, तिक्त · गुण: लघु, रूक्ष, तीक्ष्ण · तासीर: गर्म
दोषों पर असर
कफ और वात को शांत करता है (केवल बाहरी प्रयोग)।

पारंपरिक उपयोग

  • फूल पूजा और माला में उपयोग होते हैं।
  • आयुर्वेद में शोधित जड़-छाल का तेल केवल बाहरी रूप से त्वचा रोगों में बताया गया है, वह भी वैद्य की देखरेख में।
  • सूखा, धुआँ और प्रदूषण सह लेता है, इसलिए हाईवे के डिवाइडर और बाड़ में लगाया जाता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, बहुत कम पानी, किसी भी मिट्टी में। कभी भी लगा सकते हैं; बहुत कम देखभाल चाहिए।

सावधानी: बहुत ज़हरीला पौधा। पत्ता, फूल, बीज या जलाने का धुआँ — सब हानिकारक हैं। बच्चों और पशुओं से दूर लगाएँ; इसकी टहनी को सींक/कटार की तरह खाने की चीज़ों में न लगाएँ।

करेला

करेला Bitter Gourd

Momordica charantia · Cucurbitaceae (कूष्माण्ड कुल)

संस्कृत: कारवेल्ल, सुषवी

लता / बेलNursery में उपलब्ध

करेला कड़वे स्वाद वाली बेलदार सब्ज़ी है, जिसके पीले फूल और काँटेदार-उभार वाले हरे फल होते हैं। कड़वा होने के कारण आयुर्वेद में इसे खून साफ़ करने वाला और भूख बढ़ाने वाला माना गया है। बिहार में भरवाँ करेला और करेले की भुजिया बहुत लोकप्रिय है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल, पत्ते, बीज
आयुर्वेदिक गुण
रस: तिक्त, कटु · गुण: लघु, रूक्ष · तासीर: गर्म (कुछ ग्रंथों में ठंडी)
दोषों पर असर
कफ और पित्त को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • करेले की सब्ज़ी और रस का प्रयोग खून में शुगर संतुलित रखने के लिए परंपरा में किया जाता है (दवा के साथ, डॉक्टर की सलाह से)।
  • पेट के कीड़ों में करेले के पत्तों का रस लोक-परंपरा में दिया जाता है।
  • कड़वा होने से भूख बढ़ाता है और पाचन सुधारता है।
  • त्वचा के फोड़े-फुंसी और खुजली में खून साफ़ करने के लिए खाया जाता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप और जाली/मचान का सहारा चाहिए। फरवरी–मार्च और जून–जुलाई में बीज बोएँ; 55–60 दिन में फल आने लगते हैं।

सावधानी: शुगर की दवा के साथ करेले का रस ज़्यादा लेने से शुगर बहुत कम हो सकती है। गर्भावस्था में रस और बीज न लें।

करौंदा

करौंदा Karonda

Carissa carandas · Apocynaceae

संस्कृत: करमर्द, सुषेण

फलदारNursery में उपलब्ध

करौंदा काँटेदार, घनी झाड़ी है, जिस पर सफ़ेद खुशबूदार फूल और गुलाबी-लाल से काले होते छोटे फल लगते हैं। इसकी काँटेदार झाड़ी खेत और बगीचे की सबसे मज़बूत जीवित बाड़ बनाती है। करौंदे का अचार और मुरब्बा बिहार में बहुत पसंद है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल (कच्चा व पका), जड़, पत्ते
आयुर्वेदिक गुण
कच्चा फल — रस: अम्ल · गुण: गुरु · तासीर: गर्म; पका फल मधुर
दोषों पर असर
पका फल वात-पित्त शामक; कच्चा फल भूख बढ़ाता है।

पारंपरिक उपयोग

  • कच्चे फल का अचार और चटनी भूख बढ़ाने और पाचन के लिए खाई जाती है।
  • फल विटामिन C और आयरन से भरपूर है; खून की कमी में मुरब्बा खाया जाता है।
  • पका फल प्यास और गर्मी की जलन में ठंडक देता है।
  • काँटेदार झाड़ी से पशुओं को रोकने वाली बाड़ बनती है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, किसी भी मिट्टी में, सूखा सह लेता है। बरसात में लगाएँ। 2–3 साल में फल देने लगता है; बाड़ के लिए 60 सेमी की दूरी पर लगाएँ।

काजू

काजू Cashew

Anacardium occidentale · Anacardiaceae (आम्र कुल)

संस्कृत: काजूतक (आधुनिक नाम)

फलदारNursery में उपलब्ध

काजू का पेड़ अनोखा है: इसका रसीला लाल-पीला 'काजू सेब' असल में फल का डंठल है और नीचे लटकी किडनी जैसी गुठली के अंदर काजू होता है। यह ब्राज़ील से पुर्तगालियों के साथ गोवा-केरल आया। काजू ऊर्जा, अच्छे वसा और खनिजों से भरपूर मेवा है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
बीज (काजू), फल (काजू सेब), छाल

पारंपरिक उपयोग

  • भुना काजू कमज़ोरी और दुबलेपन में पौष्टिक मेवे के रूप में खाया जाता है।
  • काजू सेब का रस विटामिन C से भरपूर है; गोवा में इससे 'फेनी' बनती है।
  • लोक-परंपरा में छाल का काढ़ा दस्त में दिया जाता है।
  • मिठाई, करी और ग्रेवी को गाढ़ा और स्वादिष्ट बनाने में।

कैसे लगाएँ और देखभाल

गर्म जलवायु, पूरी धूप, रेतीली-लाल मिट्टी। बरसात में लगाएँ; पाले से बचाएँ। बिहार में फल कम आते हैं, पर पेड़ अच्छा बढ़ता है।

सावधानी: कच्ची गुठली के छिलके में तेज़ जलन वाला तेल होता है — काजू को बिना भूने-छीले न तोड़ें। मेवे से एलर्जी वाले सावधान रहें।

कालमेघ

कालमेघ Kalmegh

Andrographis paniculata · Acanthaceae (वासा कुल)

संस्कृत: भूनिम्ब, यवतिक्ता

जड़ी-बूटीNursery में उपलब्ध

कालमेघ 30–90 सेमी ऊँचा, चौकोर तने वाला छोटा पौधा है, जो इतना कड़वा होता है कि इसे 'कड़वाहट का राजा' कहा जाता है। इसका संस्कृत नाम 'भूनिम्ब' यानी 'ज़मीन का नीम' है। बंगाल-बिहार में बच्चों के लिवर और बुखार की घरेलू दवा के रूप में इसकी पुरानी परंपरा है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
पूरा पौधा (पंचांग), विशेषकर पत्ते
आयुर्वेदिक गुण
रस: तिक्त · गुण: लघु, रूक्ष · तासीर: गर्म
दोषों पर असर
कफ और पित्त को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • बुखार, सर्दी-ज़ुकाम और गले की ख़राश में कालमेघ का काढ़ा पारंपरिक रूप से दिया जाता है।
  • लिवर को सहारा देने और भूख बढ़ाने के लिए आयुर्वेद में इसका प्रयोग होता है।
  • कड़वा होने से खून साफ़ करने और त्वचा के फोड़े-फुंसी में उपयोगी माना गया है।
  • पेट के कीड़ों में लोक-परंपरा में दिया जाता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

हल्की छाँव या धूप, नम मिट्टी। मई–जून में बीज बोएँ या पौधा लगाएँ; बरसात में तेज़ी से बढ़ता है। फूल आने से ठीक पहले (सितंबर–अक्टूबर) काटकर छाँव में सुखाएँ।

सावधानी: गर्भावस्था में और गर्भ की योजना बनाते समय न लें। लगातार लंबे समय तक या अधिक मात्रा में न लें।

काली मिर्च (मरिच)

काली मिर्च (मरिच) Black Pepper

Piper nigrum · Piperaceae (पिप्पली कुल)

संस्कृत: मरिच, ऊषण, कृष्ण

मसालेNursery में उपलब्ध

काली मिर्च एक सदाबहार बेल है, जिस पर लंबे गुच्छों में हरे दाने लगते हैं जो सूखकर काले हो जाते हैं। इसे 'मसालों का राजा' और 'काला सोना' कहा गया है, जिसके व्यापार के लिए यूरोपीय भारत आए थे। आयुर्वेद के 'त्रिकटु' (सोंठ, काली मिर्च, पिप्पली) में यह शामिल है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल (दाने)
आयुर्वेदिक गुण
रस: कटु · गुण: लघु, तीक्ष्ण · तासीर: गर्म
दोषों पर असर
कफ और वात को शांत करती है, पित्त बढ़ाती है।

पारंपरिक उपयोग

  • तुलसी-अदरक के काढ़े में काली मिर्च डालना सर्दी, खाँसी और गले की ख़राश में सबसे प्रचलित घरेलू उपाय है।
  • भोजन में डालने से भूख बढ़ती है और पाचन तेज़ होता है।
  • हल्दी के साथ लेने से हल्दी का असर शरीर में बेहतर पहुँचता है।
  • शहद और काली मिर्च का मिश्रण खाँसी और कफ में दिया जाता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

छाँव, नमी और गर्मी चाहिए (केरल जैसी जलवायु)। बिहार में आधी छाँव में, नम मिट्टी वाले बड़े गमले में, किसी पेड़ या डंडे पर चढ़ाकर उगा सकते हैं; पाले और लू से बचाएँ। फल 3–4 साल बाद आते हैं।

सावधानी: एसिडिटी, अल्सर और पाइल्स में ज़्यादा काली मिर्च न लें।

केला

केला Banana

Musa paradisiaca · Musaceae (कदली कुल)

संस्कृत: कदली, रम्भा, मोचा

फलदारNursery में उपलब्ध

केला सबसे आसानी से मिलने वाला, ऊर्जा से भरपूर फल है। बिहार का हाजीपुर का मालभोग और चिनिया केला बहुत मशहूर है। केले का हर भाग काम आता है — फल, फूल (मोचा), तने का बीच का भाग और पत्ते, जिन पर भोजन परोसना शुभ माना जाता है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल (कच्चा व पका), फूल (मोचा), तना, पत्ते, जड़
आयुर्वेदिक गुण
रस: मधुर, कषाय · गुण: गुरु, स्निग्ध · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
वात और पित्त को शांत करता है, कफ बढ़ाता है।

पारंपरिक उपयोग

  • पका केला कमज़ोरी, खिलाड़ियों की थकान और पोटैशियम की कमी में तुरंत ऊर्जा देता है।
  • कच्चे केले की सब्ज़ी और उबला केला दस्त में पारंपरिक आहार है।
  • केले के तने का रस लोक-परंपरा में पेशाब की जलन और पथरी में दिया जाता है।
  • मोचा (केले का फूल) की सब्ज़ी आयरन से भरपूर मानी जाती है।
  • पत्ते छठ, सत्यनारायण पूजा और भोजन परोसने में काम आते हैं।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, भरपूर पानी और खाद चाहिए; जलभराव नहीं। फरवरी–मार्च या जून–अगस्त में पौधा लगाएँ; 11–14 महीने में घौद (गुच्छा) तैयार होता है।

सावधानी: किडनी के मरीज़ पोटैशियम के कारण डॉक्टर से पूछकर ही ज़्यादा केला खाएँ।

किस्में: Banana Malbhog ₹50 · Banana G-9 ₹50

गम्हार Gamhar

Gmelina arborea · Lamiaceae

संस्कृत: गम्भारी, काश्मरी, श्रीपर्णी

वृक्षNursery में उपलब्ध

गम्हार (गम्भारी) तेज़ी से बढ़ने वाला, चौड़े दिल के आकार के पत्तों वाला पेड़ है, जिस पर बसंत में पीले-भूरे फूल और फिर पीले फल लगते हैं। इसकी जड़ आयुर्वेद के प्रसिद्ध 'दशमूल' (दस जड़ों का योग) में शामिल है। बिहार-झारखंड में इसकी हल्की, मज़बूत लकड़ी फर्नीचर के लिए बहुत लोकप्रिय है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
जड़ (दशमूल में), फल, छाल, पत्ते
आयुर्वेदिक गुण
रस: तिक्त, कषाय, मधुर · गुण: गुरु · तासीर: गर्म
दोषों पर असर
तीनों दोषों को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • दशमूल (जिसमें गम्भारी की जड़ है) का काढ़ा बुखार, सूजन, जोड़ों के दर्द और प्रसव के बाद की कमज़ोरी में दिया जाता है।
  • पके फल ठंडक देने वाले और पौष्टिक माने गए हैं; पेशाब की जलन में उपयोग।
  • पत्तों का लेप सिरदर्द और घाव पर लोक-परंपरा में लगाया जाता है।
  • खेतों की मेड़ और बागान में लकड़ी के लिए उगाया जाता है; 8–10 साल में तैयार।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, गहरी, अच्छी निकासी वाली मिट्टी। बरसात में लगाएँ; बहुत तेज़ बढ़ता है।

गिलोय

गिलोय Giloy

Tinospora cordifolia · Menispermaceae (गुडूची कुल)

संस्कृत: गुडूची, अमृता, छिन्नरुहा

लता / बेलNursery में उपलब्ध

गिलोय पान जैसे दिल के आकार के पत्तों वाली बेल है, जो पेड़ों पर चढ़ती है और जिसके तने से हवा में लटकने वाली जड़ें निकलती हैं। तना काटकर डालने पर भी दोबारा उग जाती है, इसलिए इसे 'अमृता' और 'छिन्नरुहा' कहते हैं। आयुर्वेद में यह बुखार और रोग-प्रतिरोधक क्षमता की सबसे प्रसिद्ध औषधि है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
तना (मुख्य), पत्ते, जड़
आयुर्वेदिक गुण
रस: तिक्त, कषाय · गुण: गुरु, स्निग्ध · तासीर: गर्म · विपाक: मधुर
दोषों पर असर
तीनों दोषों को शांत करती है।

पारंपरिक उपयोग

  • तने का काढ़ा पुराने और बार-बार आने वाले बुखार में पारंपरिक रूप से दिया जाता है।
  • रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए रसायन के रूप में इसका प्रयोग होता है।
  • जोड़ों के दर्द (आमवात) और गठिया के योगों में गिलोय प्रमुख है।
  • गिलोय सत्त्व पेट की जलन और एसिडिटी में दिया जाता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

धूप या हल्की छाँव, किसी भी मिट्टी में। अँगूठे जितनी मोटी तने की कलम बरसात में लगाएँ; नीम या आम पर चढ़ाना सबसे अच्छा माना जाता है। बहुत आसानी से उगती है।

सावधानी: लंबे समय तक बिना सलाह के न लें। शुगर की दवा या ऑटो-इम्यून रोग हो तो डॉक्टर से पूछें। पहचान पक्की करें — मिलती-जुलती दूसरी बेलें गिलोय नहीं होतीं।

गुंजा (रत्ती) Gunja (Rosary Pea)

Abrus precatorius · Fabaceae (शिम्बी कुल)

संस्कृत: गुञ्जा, रक्तिका, काकचिञ्चा

लता / बेल⚠ ज़हरीला / सावधानीNursery में उपलब्ध

गुंजा एक पतली बेल है, जिसकी फलियों में चमकीले लाल रंग के, काले मुँह वाले छोटे बीज होते हैं। पुराने समय में सुनार इन्हीं बीजों से सोना तौलते थे — एक बीज = एक 'रत्ती'। इसके पत्ते मुलेठी जैसे मीठे होते हैं, पर बीज दुनिया के सबसे ख़तरनाक ज़हरों में से एक (एब्रिन) रखते हैं।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
पत्ते, जड़ (बीज केवल पूजा/सजावट के लिए)
आयुर्वेदिक गुण
रस: तिक्त, कषाय · तासीर: गर्म
दोषों पर असर
वात और कफ को शांत करती है।

पारंपरिक उपयोग

  • पत्ते मीठे होते हैं; लोक-परंपरा में मुँह के छालों और गले की ख़राश में चबाए जाते हैं।
  • जड़ और पत्तों का प्रयोग आयुर्वेद में खाँसी के योगों में, शोधन के बाद, वैद्य द्वारा होता है।
  • लाल-काले बीज पूजा, माला और गहनों की सजावट में उपयोग होते हैं (बिना तोड़े)।
  • सफ़ेद गुंजा को तंत्र-पूजा में विशेष माना जाता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

धूप, किसी भी मिट्टी में; बाड़ या पेड़ पर चढ़ जाती है। बरसात में लगाएँ। बच्चों वाले घर में बीज बनने से पहले फलियाँ तोड़ दें।

सावधानी: बहुत ज़हरीले बीज। एक चबाया हुआ बीज भी बच्चे की जान ले सकता है। बीज कभी न तोड़ें, चबाएँ या छेद करके माला बनाते समय हाथ से न छुएँ — दस्ताने पहनें।

गुलदाउदी

गुलदाउदी Chrysanthemum

Chrysanthemum morifolium · Asteraceae (भृंगराज कुल)

संस्कृत: सेवन्ती (कुछ ग्रंथों में)

फूलNursery में उपलब्ध

गुलदाउदी सर्दियों का सबसे शानदार फूल है, जो सफ़ेद, पीले, लाल, गुलाबी और बैंगनी रंगों में छोटे बटन से लेकर बड़े गेंद जितने आकार में खिलता है। चीन और जापान की पारंपरिक चिकित्सा में इसके फूलों की चाय बहुत प्रसिद्ध है। भारत में यह मुख्य रूप से सजावट और पूजा का फूल है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फूल

पारंपरिक उपयोग

  • सूखे फूलों की चाय पारंपरिक चीनी चिकित्सा में आँखों की थकान और गर्मी की जलन में पी जाती है।
  • फूल पूजा, माला और सजावट में काम आते हैं।
  • नासा के अध्ययन में इसे घर की हवा साफ़ करने वाले पौधों में गिना गया था।
  • बालकनी और छत पर सर्दी के रंगों के लिए सबसे अच्छा गमले का पौधा।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, उपजाऊ मिट्टी। जुलाई–अगस्त में कलम या पौधा लगाएँ; नवंबर–दिसंबर में फूल आते हैं। फूलों के बाद पौधा काटकर अगले साल के लिए नई कलम तैयार करें।

सावधानी: कुछ लोगों को इसके परागकण या रस से त्वचा पर एलर्जी होती है।

गुलमोहर

गुलमोहर Gulmohar

Delonix regia · Fabaceae (शिम्बी कुल)

संस्कृत: राजवृक्ष (लोक नाम), कृष्णचूड़ा

वृक्षNursery में उपलब्ध

गर्मी में जब गुलमोहर लाल-नारंगी फूलों से ढक जाता है तो पूरी सड़क जगमगा उठती है। इसकी फैली हुई छतरी जैसी शाखाएँ घनी छाया देती हैं और पत्ते इमली जैसे बारीक होते हैं। यह मूल रूप से मेडागास्कर का पेड़ है, इसलिए पुराने आयुर्वेद ग्रंथों में नहीं है, पर लोक-चिकित्सा में इसके कुछ उपयोग हैं।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फूल, पत्ते, छाल

पारंपरिक उपयोग

  • लोक-परंपरा में फूलों और पत्तों का लेप जोड़ों के दर्द और सूजन पर लगाया जाता है।
  • छाल का काढ़ा लोक-चिकित्सा में बुखार में दिया जाता है।
  • सड़क, स्कूल और पार्क में छाया और सुंदरता के लिए सबसे लोकप्रिय पेड़।
  • फूल मधुमक्खियों और पक्षियों को आकर्षित करते हैं।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, सूखा सह लेता है, तेज़ी से बढ़ता है। बरसात में लगाएँ। इसकी जड़ें सतह पर फैलती हैं, इसलिए दीवार और नाली से 5–6 मीटर दूर लगाएँ।

सावधानी: बीज खाने योग्य नहीं हैं।

गुलाब

गुलाब Rose

Rosa damascena / Rosa × bourboniana (देसी गुलाब) · Rosaceae (गुलाब कुल)

संस्कृत: शतपत्री, तरुणी

फूलNursery में उपलब्ध

गुलाब को 'फूलों का राजा' कहा जाता है। दवा, गुलाबजल और गुलकंद के लिए खुशबूदार देसी (दमिश्क) गुलाब सबसे अच्छा माना जाता है, न कि बिना खुशबू वाले हाइब्रिड गुलाब। आयुर्वेद में गुलाब ठंडक देने वाला, मन प्रसन्न करने वाला और हृदय के लिए हितकारी बताया गया है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
पंखुड़ियाँ, फूल
आयुर्वेदिक गुण
रस: मधुर, तिक्त, कषाय · गुण: लघु, स्निग्ध · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
वात और पित्त को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • गुलकंद (पंखुड़ी और मिश्री) गर्मी, पेट की जलन, मुँह के छालों और कब्ज़ में पारंपरिक रूप से खाया जाता है।
  • गुलाबजल आँखों को ठंडक देने और चेहरे की टोनर के रूप में लगाया जाता है।
  • पंखुड़ियों का शरबत गर्मी में ठंडक और ताज़गी देता है।
  • पूजा, माला, इत्र और सजावट में गुलाब का विशेष स्थान है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

कम से कम 6 घंटे धूप, उपजाऊ अच्छी निकासी वाली मिट्टी और नियमित खाद। अक्टूबर–फरवरी लगाने का सबसे अच्छा समय है। हर साल अक्टूबर में छँटाई करें।

सावधानी: गुलकंद और खाने के लिए केवल बिना कीटनाशक वाली पंखुड़ियाँ लें।

किस्में: Desi Gulab ₹100 · Rose (Red Hybrid) ₹115 · Button Rose ₹100

गूलर Gular (Cluster Fig)

Ficus racemosa · Moraceae (वट कुल)

संस्कृत: उदुम्बर, जन्तुफल, यज्ञाङ्ग

वृक्षNursery में उपलब्ध

गूलर (उदुम्बर) बरगद-पीपल परिवार का पेड़ है, जिसके फल तने और मोटी शाखाओं पर गुच्छों में लगते हैं। इसके फूल फल के अंदर छिपे रहते हैं, इसलिए कहावत है 'गूलर का फूल' (जो कभी न दिखे)। यह पंचवल्कल (पाँच पवित्र पेड़ों की छाल) में से एक है और यज्ञ की समिधा में उपयोग होता है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल, छाल, दूध (लेटेक्स), पत्ते, जड़
आयुर्वेदिक गुण
रस: कषाय, मधुर · गुण: गुरु, रूक्ष · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
कफ और पित्त को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • कसैली छाल का काढ़ा दस्त, खूनी बवासीर और घाव धोने में पारंपरिक रूप से उपयोग होता है।
  • पके फल पौष्टिक माने जाते हैं; कच्चे फलों की सब्ज़ी देहात में बनती है।
  • आयुर्वेद में इसके फल और छाल का प्रयोग शुगर संतुलन के योगों में बताया गया है।
  • छाल और दूध मुँह के छालों और फटी एड़ियों पर लगाए जाते हैं।
  • पूजा-पाठ और हवन में इसकी लकड़ी शुभ मानी जाती है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, नम मिट्टी पसंद है; नदी-तालाब किनारे बहुत अच्छा बढ़ता है। बरसात में लगाएँ। घर की नींव से दूर लगाएँ, क्योंकि जड़ें बड़ी होती हैं।

सावधानी: पके फलों के अंदर अक्सर छोटे कीड़े (परागण करने वाले ततैये) होते हैं — खोलकर, साफ़ करके ही खाएँ।

गेंदा

गेंदा Marigold

Tagetes erecta · Asteraceae (भृंगराज कुल)

संस्कृत: स्थूलपुष्प, झण्डू (लोक नाम)

फूलNursery में उपलब्ध

गेंदा भारत का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला पूजा और माला का फूल है। यह मूल रूप से मेक्सिको से आया, इसलिए पुराने ग्रंथों में नहीं है, पर लोक-चिकित्सा में इसके पत्ते और फूल घाव पर लगाने के लिए प्रसिद्ध हैं। इसकी गंध से कई कीट दूर रहते हैं।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फूल, पत्ते

पारंपरिक उपयोग

  • पत्तों को पीसकर कटे-छिले घाव और सूजन पर लगाने की लोक-परंपरा है।
  • पत्तों का रस कान दर्द में लोक-परंपरा में डाला जाता है (कान का पर्दा फटा हो तो नहीं)।
  • फूल पूजा, माला, तोरण और त्योहारों की सजावट में काम आते हैं।
  • सब्ज़ी के बगीचे में किनारे लगाने से जड़ के कीड़े (निमेटोड) और कुछ कीट कम होते हैं।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, सामान्य मिट्टी। सितंबर–अक्टूबर (सर्दी के लिए) और जनवरी–फरवरी (गर्मी के लिए) में लगाएँ; 50–60 दिन में फूल आने लगते हैं। कलियाँ आने से पहले ऊपर की चोटी तोड़ने से पौधा घना होता है।

किस्में: Genda (African Orange) ₹50 · Genda (Yellow) ₹50

घृतकुमारी (एलोवेरा)

घृतकुमारी (एलोवेरा) Aloe Vera

Aloe vera (Aloe barbadensis) · Asphodelaceae

संस्कृत: घृतकुमारी, कुमारी

जड़ी-बूटीNursery में उपलब्ध

घृतकुमारी मोटे, गूदेदार, किनारे पर छोटे काँटों वाले पत्तों का रसीला पौधा है। पत्ते काटने पर अंदर से घी जैसा पारदर्शी जेल निकलता है, इसीलिए नाम 'घृत-कुमारी' है। आयुर्वेद में 'कुमारी आसव' इसी से बनता है और आज यह क्रीम, शैम्पू और जूस में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला पौधा है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
पत्तों का गूदा (जेल), पत्तों का पीला रस
आयुर्वेदिक गुण
रस: तिक्त, मधुर · गुण: गुरु, स्निग्ध, पिच्छिल · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
वात और पित्त को शांत करती है, कफ भी संतुलित करती है।

पारंपरिक उपयोग

  • ताज़ा जेल हल्के जलने, धूप से झुलसी त्वचा, कटने-छिलने पर लगाने से ठंडक और जल्दी भराव होता है।
  • चेहरे के मुहाँसे और रूखी त्वचा में जेल को सीधे लगाया जाता है।
  • बालों में जेल लगाने से रूसी और खुजली कम होती है।
  • आयुर्वेद में इसके गूदे का प्रयोग लिवर, पाचन और स्त्री रोगों के योगों में होता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

धूप वाली जगह, रेतीली मिट्टी और बहुत कम पानी — मिट्टी पूरी सूखने पर ही पानी दें। किसी भी मौसम में लगा सकते हैं; बगल से बच्चे (नए पौधे) निकलते रहते हैं।

सावधानी: पत्ते के छिलके के पास का पीला रस तेज़ जुलाब है — खाने के लिए जेल को अच्छी तरह धोकर ही लें। गर्भावस्था में अंदरूनी सेवन न करें।

चंदन

चंदन Sandalwood

Santalum album · Santalaceae

संस्कृत: श्रीखण्ड, चन्दन, मलयज

वृक्षNursery में उपलब्ध

सफ़ेद चंदन दुनिया की सबसे क़ीमती सुगंधित लकड़ियों में से एक है। यह आंशिक परजीवी पेड़ है, जिसकी जड़ें पास के दूसरे पौधों की जड़ों से कुछ पोषण लेती हैं। आयुर्वेद में चंदन सबसे ठंडक देने वाली औषधि है और तिलक, पूजा व इत्र में इसका विशेष स्थान है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
अंदर की सुगंधित लकड़ी (सारकाष्ठ), तेल
आयुर्वेदिक गुण
रस: तिक्त, मधुर · गुण: लघु, रूक्ष · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
पित्त और कफ को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • चंदन का लेप माथे पर लगाने से सिरदर्द और गर्मी में ठंडक मिलती है।
  • त्वचा की जलन, घमौरी और मुहाँसों पर चंदन का लेप लगाया जाता है।
  • आयुर्वेद में इसका प्रयोग पेशाब की जलन और ज़्यादा प्यास में बताया गया है।
  • चंदन तेल इत्र, अगरबत्ती और साबुन में उपयोग होता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, अच्छी निकासी वाली लाल या दोमट मिट्टी। शुरुआत में इसके साथ अरहर, कढ़ी पत्ता या मेहंदी जैसा 'साथी पौधा' लगाएँ, क्योंकि यह जड़ों से उनसे पोषण लेता है। सुगंधित लकड़ी बनने में 15–20 साल लगते हैं।

सावधानी: चंदन का पेड़ काटने और बेचने के लिए राज्य के वन-नियमों का पालन ज़रूरी है।

चमेली Chameli (Jati Jasmine)

Jasminum grandiflorum · Oleaceae (पारिजात कुल)

संस्कृत: जाती, मालती, सुमना

फूलNursery में उपलब्ध

चमेली (जाती) एक फैलने वाली झाड़ीदार बेल है, जिसके सफ़ेद, पाँच पंखुड़ियों वाले, शाम को खिलने वाले फूलों की खुशबू मन मोह लेती है। चमेली का तेल और इत्र सदियों से मशहूर है। आयुर्वेद में इसके पत्ते मुँह के छालों की प्रसिद्ध औषधि हैं ('जात्यादि तेल' इसी के नाम पर है)।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
पत्ते, फूल, जड़
आयुर्वेदिक गुण
रस: तिक्त, कषाय · गुण: लघु, स्निग्ध · तासीर: गर्म (कुछ ग्रंथों में सामान्य)
दोषों पर असर
वात और पित्त को शांत करती है।

पारंपरिक उपयोग

  • कोमल पत्ते चबाने या उनके काढ़े से कुल्ला करने से मुँह के छालों और मसूड़ों की सूजन में आराम मिलता है।
  • जात्यादि तेल घाव, कटने-जलने और पुराने घावों पर लगाया जाता है।
  • फूलों से इत्र, तेल और गजरा बनता है; खुशबू मन को शांत करती है।
  • पत्तों का लेप त्वचा के फोड़ों और दाद में लोक-परंपरा में लगाया जाता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप या हल्की छाँव, अच्छी निकासी वाली मिट्टी। बरसात या फरवरी–मार्च में लगाएँ। जाली या बाड़ का सहारा दें; गर्मी और बरसात में खूब फूलती है। सर्दी के अंत में छँटाई करें।

चम्पा

चम्पा Champa (Son Champa)

Magnolia champaca · Magnoliaceae

संस्कृत: चम्पक, हेमपुष्प, स्वर्णचम्पक

वृक्षNursery में उपलब्ध

सोन चम्पा (स्वर्ण चम्पक) एक सदाबहार पेड़ है, जिस पर सुनहरे-नारंगी, बेहद तेज़ और मीठी खुशबू वाले फूल आते हैं। इन फूलों से दुनिया के महँगे इत्र बनते हैं और ये देवताओं को चढ़ाए जाते हैं। ध्यान दें: बगीचों में आम 'चम्पा/गुलैची' (प्लूमेरिया) अलग पौधा है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फूल, छाल, बीज
आयुर्वेदिक गुण
रस: कटु, तिक्त, कषाय · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
कफ और पित्त को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • आयुर्वेद में फूलों का प्रयोग जलन, पेशाब की जलन और त्वचा रोगों में बताया गया है।
  • छाल का काढ़ा लोक-परंपरा में बुखार में दिया जाता है।
  • फूलों से इत्र और खुशबूदार तेल बनता है; बालों में लगाने की परंपरा है।
  • मंदिर और घर के आँगन में खुशबू के लिए लगाया जाने वाला शुभ पेड़।

कैसे लगाएँ और देखभाल

धूप या हल्की छाँव, उपजाऊ, नम पर अच्छी निकासी वाली मिट्टी। बरसात में लगाएँ। कलमी पौधा 3–4 साल में फूलने लगता है।

चाँदनी

चाँदनी Chandni (Tagar)

Tabernaemontana divaricata · Apocynaceae

संस्कृत: नन्दीवृक्ष, तगर (लोक प्रयोग)

फूलNursery में उपलब्ध

चाँदनी चमकीले हरे पत्तों वाली झाड़ी है, जिस पर लगभग पूरे साल चाँदनी जैसे सफ़ेद, पंखे जैसे घूमे हुए फूल खिलते हैं। यह बगीचे, बाड़ और मंदिर के फूलों के लिए सबसे लोकप्रिय पौधों में है। (आयुर्वेद का असली 'तगर' Valeriana wallichii जड़ी है, जो अलग पौधा है।)

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
जड़, पत्ते, फूल, दूध

पारंपरिक उपयोग

  • फूल रोज़ की पूजा और माला में चढ़ाए जाते हैं।
  • लोक-परंपरा में जड़ को चबाकर दाँत दर्द में राहत ली जाती है।
  • पत्तों का दूध घाव पर लगाने और आँखों की जलन में फूलों का पानी डालने की लोक-परंपरा है (सावधानी से)।
  • घनी झाड़ी होने से बाड़ और गमलों में सालभर हरियाली देती है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

धूप या हल्की छाँव, सामान्य मिट्टी, नियमित पानी। किसी भी मौसम में लगा सकते हैं; बहुत कम देखभाल चाहिए।

सावधानी: इसका दूध और जड़ अधिक मात्रा में हानिकारक हैं; अंदरूनी सेवन बिना सलाह के न करें।

किस्में: Chandni (Tagar) ₹100 · Chandni Double ₹115 · Chandni Dwarf ₹115

चिरायता Chirayta

Swertia chirayita · Gentianaceae

संस्कृत: किराततिक्त, भूनिम्ब (कुछ ग्रंथों में)

जड़ी-बूटीNursery में उपलब्ध

चिरायता हिमालय के ठंडे इलाकों में उगने वाली छोटी, बहुत कड़वी जड़ी है। गाँवों में 'चिरायता का पानी' खून साफ़ करने और बुखार के लिए दादी-नानी की सबसे जानी-मानी दवा रही है। बाज़ार में सूखा चिरायता बिकता है, पर इसकी मिलावट भी बहुत होती है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
पूरा पौधा (पंचांग)
आयुर्वेदिक गुण
रस: तिक्त · गुण: लघु, रूक्ष · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
कफ और पित्त को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • रात भर भिगोए चिरायते का पानी सुबह खाली पेट खून साफ़ करने और त्वचा के फोड़े-फुंसी में लिया जाता है।
  • बुखार में इसका काढ़ा पारंपरिक रूप से दिया जाता है (बुखार की जाँच और इलाज डॉक्टर से कराएँ)।
  • कड़वा होने से भूख बढ़ाता है और लिवर को सहारा देता है।
  • पेट के कीड़ों में लोक-परंपरा में दिया जाता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

यह ठंडी पहाड़ी जलवायु का पौधा है। बिहार के मैदान में केवल गमले में, हल्की छाँव, ठंडी जगह और नम पर अच्छी निकासी वाली मिट्टी में अक्टूबर–फरवरी के बीच रखें; गर्मी में बचाना मुश्किल होता है। औषधीय बगीचे में पहचान और जानकारी के लिए अच्छा।

सावधानी: गर्भावस्था में न लें। शुगर की दवा के साथ लेने पर शुगर बहुत कम हो सकती है।

चीकू

चीकू Chikoo (Sapota)

Manilkara zapota · Sapotaceae

फलदारNursery में उपलब्ध

चीकू (सपोटा) भूरे छिलके और मीठे, दानेदार गूदे वाला फल है, जो मूल रूप से मध्य अमेरिका का है। पेड़ सदाबहार और घना होता है और साल में दो बार फल देता है। ऊर्जा और रेशे से भरपूर होने के कारण यह बच्चों और बुज़ुर्गों के लिए अच्छा फल है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल, छाल

पारंपरिक उपयोग

  • पका चीकू तुरंत ऊर्जा देता है और रेशे के कारण कब्ज़ में मदद करता है।
  • चीकू का मिल्कशेक कमज़ोरी में पौष्टिक आहार है।
  • लोक-परंपरा में कसैली छाल का काढ़ा दस्त में दिया जाता है।
  • इसी पेड़ के दूध (चिकल) से पहले च्युइंग गम बनाया जाता था।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, गहरी मिट्टी, जलभराव से बचाएँ। बरसात में कलमी पौधा लगाएँ; 3–4 साल में फल। पाले (कड़ाके की ठंड) से छोटे पौधे बचाएँ।

सावधानी: कच्चा चीकू न खाएँ — उसमें दूध और कसैलापन होता है। शुगर के मरीज़ मात्रा का ध्यान रखें।

जामुन

जामुन Jamun

Syzygium cumini · Myrtaceae (जम्बू कुल)

संस्कृत: जम्बू, महाफला, राजजम्बू

फलदारNursery में उपलब्ध

जामुन ऊँचा, घना, सदाबहार पेड़ है, जिसके बैंगनी-काले, खट्टे-मीठे-कसैले फल बरसात की शुरुआत में पकते हैं। भारत का प्राचीन नाम 'जम्बूद्वीप' इसी पेड़ से जुड़ा माना जाता है। आयुर्वेद में इसकी गुठली शुगर संतुलन के लिए प्रसिद्ध है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल, गुठली (बीज), छाल, पत्ते
आयुर्वेदिक गुण
रस: कषाय, मधुर, अम्ल · गुण: गुरु, रूक्ष · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
कफ और पित्त को शांत करता है, वात बढ़ा सकता है।

पारंपरिक उपयोग

  • जामुन की गुठली का चूर्ण शुगर संतुलित रखने के लिए पारंपरिक रूप से लिया जाता है (डॉक्टर की दवा के साथ, उसकी जगह नहीं)।
  • कसैला होने से फल और छाल दस्त और पेचिश में उपयोगी माने गए हैं।
  • पत्ते और छाल का काढ़ा मुँह के छालों और मसूड़ों के लिए कुल्ले में।
  • फल का सिरका पाचन और भूख के लिए उपयोग होता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, गहरी मिट्टी, नम ज़मीन भी सह लेता है। बरसात में लगाएँ। कलमी पौधा 4–5 साल में फल देता है; बीजू पेड़ 8–10 साल में।

सावधानी: खाली पेट या दूध के तुरंत बाद ज़्यादा जामुन न खाएँ। शुगर की दवा के साथ शुगर की जाँच करते रहें।

किस्में: Jamun ₹100 · Jamun Hybrid ₹100

जायफल

जायफल Nutmeg

Myristica fragrans · Myristicaceae

संस्कृत: जातीफल, जातीकोश (जावित्री)

मसाले⚠ ज़हरीला / सावधानीNursery में उपलब्ध

जायफल एक सदाबहार उष्णकटिबंधीय पेड़ है; इसके फल के अंदर बीज 'जायफल' होता है और बीज के ऊपर लाल जाली जैसी परत 'जावित्री' कहलाती है। दोनों मसाले और दवा में काम आते हैं। आयुर्वेद में जायफल नींद, दस्त और दर्द में बहुत थोड़ी मात्रा में दिया जाता है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
बीज (जायफल), बीज का लाल आवरण (जावित्री)
आयुर्वेदिक गुण
रस: तिक्त, कटु · गुण: लघु, तीक्ष्ण · तासीर: गर्म
दोषों पर असर
कफ और वात को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • चुटकी भर जायफल दूध में डालकर रात को लेने से अच्छी नींद आने की परंपरा है।
  • दस्त और पेट दर्द में जायफल को घिसकर चुटकी भर लेने का घरेलू नुस्खा है; छोटे बच्चों को डॉक्टर से पूछे बिना न दें।
  • जायफल का तेल दाँत दर्द और जोड़ों के दर्द में बाहरी रूप से लगाया जाता है।
  • गरम मसाला, मिठाई और पकवानों में खुशबू के लिए।

कैसे लगाएँ और देखभाल

गर्म, नम, छायादार जलवायु का पेड़ है (केरल, कर्नाटक)। बिहार में आधी छाँव, नम मिट्टी में लगाएँ और पाले से बचाएँ। फल के लिए नर और मादा दोनों पेड़ चाहिए और 6–8 साल लगते हैं।

सावधानी: चुटकी से ज़्यादा जायफल नशा, चक्कर, घबराहट और दिल की धड़कन तेज़ कर सकता है। गर्भावस्था में न लें।

जूही

जूही Juhi

Jasminum auriculatum · Oleaceae (पारिजात कुल)

संस्कृत: यूथिका, गणिका

लता / बेलNursery में उपलब्ध

जूही चमेली परिवार की नाज़ुक बेल है, जिस पर बरसात में छोटे, सफ़ेद, बहुत मीठी खुशबू वाले फूल गुच्छों में खिलते हैं। इसके फूल गजरे और इत्र के लिए प्रसिद्ध हैं। आयुर्वेद में यह ठंडक देने वाली और मुँह-त्वचा के रोगों में उपयोगी बताई गई है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फूल, पत्ते
आयुर्वेदिक गुण
रस: तिक्त, कषाय · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
पित्त और कफ को शांत करती है।

पारंपरिक उपयोग

  • पत्तों का काढ़ा मुँह के छालों और गले की ख़राश में कुल्ले के लिए।
  • फूलों का लेप त्वचा की जलन और आँखों की थकान में ठंडक के लिए (बाहरी)।
  • फूलों से गजरा, माला और इत्र बनता है।
  • शाम को खिलने वाली खुशबू से आँगन और बालकनी महक उठती है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

धूप या हल्की छाँव, अच्छी निकासी वाली मिट्टी। बरसात में लगाएँ; जाली का सहारा दें। मई से सितंबर तक फूल देती है।

तुलसी

तुलसी Tulsi (Holy Basil)

Ocimum tenuiflorum (O. sanctum) · Lamiaceae (तुलसी कुल)

संस्कृत: तुलसी, सुरसा, ग्राम्या, देवदुन्दुभि

जड़ी-बूटीNursery में उपलब्ध

तुलसी हर हिंदू घर के आँगन की शोभा और सबसे पूजनीय पौधा है। हरे पत्तों वाली 'राम तुलसी' और बैंगनी पत्तों वाली 'श्याम (कृष्ण) तुलसी' दोनों औषधीय हैं। आयुर्वेद में तुलसी को सर्दी-खाँसी, बुखार और रोग-प्रतिरोधक क्षमता की सबसे सुलभ औषधि माना गया है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
पत्ते, मंजरी (बीज), जड़, पूरा पौधा
आयुर्वेदिक गुण
रस: कटु, तिक्त · गुण: लघु, रूक्ष · तासीर: गर्म
दोषों पर असर
कफ और वात को शांत करती है, पित्त बढ़ा सकती है।

पारंपरिक उपयोग

  • तुलसी, अदरक, काली मिर्च और गुड़ का काढ़ा सर्दी-ज़ुकाम, खाँसी और हल्के बुखार में पारंपरिक घरेलू उपाय है।
  • रोज़ सुबह 4–5 पत्ते लेना रोग-प्रतिरोधक क्षमता के लिए परंपरा में प्रचलित है।
  • पत्तों का रस शहद के साथ बच्चों की खाँसी में दिया जाता है।
  • गर्मी में ठंडक के लिए मंजरी (बीज) को पानी में भिगोकर लिया जाता है।
  • तुलसी विवाह, कार्तिक पूजा और हर पूजा-प्रसाद में अनिवार्य है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, अच्छी निकासी वाली मिट्टी, सामान्य पानी। फरवरी–मार्च या जून–जुलाई में लगाएँ। मंजरी (फूल) तोड़ते रहें तो पौधा घना रहता है। सर्दी में पाले से बचाने के लिए रात को ढक दें।

सावधानी: गर्भावस्था में और खून पतला करने या शुगर की दवा ले रहे हों तो दवा की तरह अधिक मात्रा में न लें।

किस्में: Rama Tulsi ₹60 · Shyama (Krishna) Tulsi ₹60

तून Toon (Indian Mahogany)

Toona ciliata · Meliaceae (निम्ब कुल)

संस्कृत: तुन्न, नन्दीवृक्ष (कुछ ग्रंथों में)

वृक्षNursery में उपलब्ध

तून (लाल देवदारु, इंडियन महोगनी) नीम परिवार का ऊँचा, तेज़ी से बढ़ने वाला पेड़ है। इसकी लाल, हल्की और दीमक-रोधी लकड़ी फर्नीचर, दरवाज़े और वाद्य-यंत्र बनाने के लिए बहुत क़ीमती है। बसंत में इस पर छोटे सफ़ेद खुशबूदार फूल आते हैं।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
छाल, फूल, पत्ते, लकड़ी
आयुर्वेदिक गुण
रस: तिक्त, कषाय, मधुर · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
कफ और पित्त को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • कसैली छाल का काढ़ा लोक-परंपरा में दस्त, पेचिश और बुखार में दिया जाता है।
  • फूलों से पहले पीला-लाल रंग (डाई) बनाया जाता था।
  • छाल और पत्तों का लेप घाव पर लगाया जाता है।
  • खेत की मेड़ और बागान में लकड़ी के लिए उगाया जाने वाला मूल्यवान पेड़।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, गहरी, नम पर अच्छी निकासी वाली मिट्टी। बरसात में लगाएँ; बहुत तेज़ बढ़ता है। 12–15 साल में लकड़ी तैयार होती है।

तेजपत्ता

तेजपत्ता Tejpatta (Bay Leaf)

Cinnamomum tamala · Lauraceae (कर्पूर कुल)

संस्कृत: तमालपत्र, पत्रक

मसालेNursery में उपलब्ध

तेजपत्ता (तमालपत्र) एक मध्यम आकार का सदाबहार पेड़ है, जिसके पत्तों में तीन लंबी नसें होती हैं और जिनकी खुशबू दालचीनी जैसी होती है। यही पत्ते हमारी दाल, बिरयानी और पुलाव में डाले जाते हैं। आयुर्वेद के 'त्रिजातक' (इलायची, दालचीनी, तेजपत्ता) में यह शामिल है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
पत्ते (मुख्य), छाल
आयुर्वेदिक गुण
रस: कटु, मधुर · गुण: लघु, तीक्ष्ण, पिच्छिल · तासीर: गर्म
दोषों पर असर
कफ और वात को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • दाल-सब्ज़ी में तेजपत्ता डालने से खाना सुपाच्य बनता है और गैस कम होती है।
  • पत्तों का काढ़ा सर्दी, खाँसी और जुकाम में पारंपरिक रूप से लिया जाता है।
  • आयुर्वेद में इसका प्रयोग शुगर संतुलन के योगों में बताया गया है।
  • सूखे पत्ते अनाज में रखने से कीड़े कम लगते हैं।

कैसे लगाएँ और देखभाल

धूप या हल्की छाँव, अच्छी निकासी वाली मिट्टी। बरसात में लगाएँ; बड़े गमले में भी रखा जा सकता है। 2–3 साल बाद पत्ते तोड़कर छाँव में सुखाएँ।

दालचीनी

दालचीनी Cinnamon

Cinnamomum verum · Lauraceae (कर्पूर कुल)

संस्कृत: त्वक्, दारुसिता, गुडत्वक्

मसालेNursery में उपलब्ध

असली दालचीनी (सीलोन सिनेमन) एक छोटा सदाबहार पेड़ है, जिसकी पतली अंदरूनी छाल सूखकर लिपटी हुई डंडियों (स्टिक) का रूप ले लेती है। बाज़ार की मोटी, सख़्त 'दालचीनी' अक्सर कैसिया (दूसरा पेड़) होती है। आयुर्वेद में यह पाचन, सर्दी और खुशबू के लिए प्रसिद्ध है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
अंदर की छाल (मुख्य), पत्ते, तेल
आयुर्वेदिक गुण
रस: कटु, तिक्त, मधुर · गुण: लघु, रूक्ष, तीक्ष्ण · तासीर: गर्म
दोषों पर असर
कफ और वात को शांत करती है।

पारंपरिक उपयोग

  • चाय और काढ़े में दालचीनी डालना सर्दी-ज़ुकाम और गले की ख़राश में पारंपरिक उपाय है।
  • भारी भोजन में गरम मसाले के रूप में डालने से पाचन अच्छा होता है।
  • दालचीनी और शहद का मिश्रण खाँसी में घरेलू नुस्खे के रूप में लिया जाता है।
  • दालचीनी तेल दाँत दर्द में बाहरी रूप से लगाया जाता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

गर्म, नम जलवायु पसंद है। बिहार में धूप या हल्की छाँव, अच्छी निकासी वाली मिट्टी और पाले से बचाव के साथ उगाया जा सकता है। झाड़ी की तरह बार-बार काटकर नई टहनियों से छाल ली जाती है।

सावधानी: चुटकी से ज़्यादा रोज़ न लें, विशेषकर कैसिया; लिवर के मरीज़ और गर्भवती महिलाएँ दवा की तरह न लें।

देवदार Deodar

Cedrus deodara · Pinaceae

संस्कृत: देवदारु, सुरदारु, भद्रदारु

वृक्षNursery में उपलब्ध

देवदार (देवताओं की लकड़ी) हिमालय का भव्य, शंकु आकार का सदाबहार पेड़ है, जिसके पत्ते सुई जैसे और लकड़ी खुशबूदार, सड़न-रोधी होती है। हिमाचल का राज्य वृक्ष है। आयुर्वेद में देवदारु वात रोग, जोड़ों के दर्द और सूजन की प्रमुख औषधि है और 'देवदार्वादि' कई योगों में शामिल है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
लकड़ी (सारकाष्ठ), तेल, राल
आयुर्वेदिक गुण
रस: तिक्त · गुण: लघु, स्निग्ध · तासीर: गर्म
दोषों पर असर
कफ और वात को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • देवदारु की लकड़ी का चूर्ण और तेल आयुर्वेद में जोड़ों के दर्द, सूजन और गठिया में प्रयोग होता है।
  • देवदार तेल त्वचा के फंगल संक्रमण और खुजली में बाहरी रूप से लगाया जाता है।
  • खाँसी और कफ के योगों में देवदारु डाला जाता है।
  • खुशबूदार लकड़ी मंदिर, घर और अगरबत्ती में उपयोग होती है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

यह ठंडे पहाड़ों (1,500–3,000 मीटर) का पेड़ है। बिहार के मैदान की गर्मी इसके लिए कठिन है — हल्की छाँव, नम पर अच्छी निकासी वाली मिट्टी और गर्मी में नियमित पानी के साथ गमले में शोभा और औषधीय-बगीचे के लिए रखा जा सकता है; बड़ा पेड़ बनने की उम्मीद न करें।

सावधानी: देवदार तेल अंदरूनी रूप से न लें।

धतूरा

धतूरा Dhatura

Datura metel · Solanaceae (कंटकारी कुल)

संस्कृत: धत्तूर, कनक, उन्मत्त

फूल⚠ ज़हरीला / सावधानीNursery में उपलब्ध

धतूरा बड़े, सफ़ेद या बैंगनी, तुरही जैसे फूलों और काँटेदार गोल फलों वाला पौधा है। इसके फूल और फल भगवान शिव को चढ़ाए जाते हैं। संस्कृत नाम 'उन्मत्त' (पागल कर देने वाला) बताता है कि यह कितना ज़हरीला है — इसके बीज खाने से बेहोशी और मौत तक हो सकती है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
केवल पूजा व बाहरी उपयोग — पत्ते (चिकित्सक की देखरेख में)
आयुर्वेदिक गुण
रस: तिक्त, कटु · गुण: गुरु · तासीर: गर्म
दोषों पर असर
कफ और वात को शांत करता है (शोधन के बाद, वैद्य द्वारा)।

पारंपरिक उपयोग

  • फूल और फल शिव पूजा, विशेषकर महाशिवरात्रि और सावन में चढ़ाए जाते हैं।
  • पुराने समय में पत्तों का गरम लेप जोड़ों के दर्द और सूजन पर बाहरी रूप से बाँधा जाता था।
  • आयुर्वेद में शोधित धतूरे का प्रयोग केवल अनुभवी वैद्य द्वारा दमा के कुछ योगों में बताया गया है।
  • डबल फूलों वाली किस्म बगीचे में सजावट के लिए लगाई जाती है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, किसी भी मिट्टी में; पानी कम। बीज या पौधे से कभी भी लग जाता है। बच्चों की पहुँच से दूर लगाएँ और फल पकने से पहले तोड़ दें।

सावधानी: बहुत ज़हरीला पौधा। बीज, पत्ते या फूल कभी न खाएँ और किसी को न दें। बच्चे इसके बीज को कभी-कभी खाने की चीज़ समझ लेते हैं — सावधान रहें।

नागफनी Nagphani (Prickly Pear)

Opuntia ficus-indica / Opuntia stricta · Cactaceae

संस्कृत: वज्रकण्टक (लोक प्रयोग)

जड़ी-बूटीNursery में उपलब्ध

नागफनी चपटे, हरे, काँटेदार पैड (जो असल में तना हैं) वाला कैक्टस है, जिस पर पीले फूल और लाल-बैंगनी फल लगते हैं। यह मूल रूप से अमेरिका का है, पर भारत में सैकड़ों साल से गाँवों की बाड़ में उगता रहा है। मेक्सिको में इसके कोमल पैड (नोपल) की सब्ज़ी बड़े चाव से खाई जाती है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
पत्ते जैसे चपटे तने (पैड), फल, फूल

पारंपरिक उपयोग

  • पैड को काँटे साफ़ करके, बीच से चीरकर, गरम करके सूजन और जोड़ों के दर्द पर बाँधने की लोक-परंपरा है।
  • पका फल (काँटे हटाकर) मीठा और खाने योग्य है; इसका रस विटामिन और रेशे से भरपूर है।
  • कोमल पैड की सब्ज़ी को शुगर संतुलन में सहायक माना जाता है (मेक्सिको की परंपरा)।
  • काँटेदार होने से खेत और घर की सुरक्षित बाड़ बनती है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, रेतीली मिट्टी, बहुत कम पानी। एक पैड तोड़कर 2–3 दिन सुखाएँ और फिर मिट्टी में आधा गाड़ दें — जड़ें निकल आती हैं। बरसात में ज़्यादा पानी से बचाएँ।

सावधानी: बारीक काँटे (ग्लोकिड) त्वचा में घुसकर खुजली करते हैं; दस्ताने पहनकर ही छुएँ। बिना काँटे साफ़ किए फल न खाएँ।

नारंगी (संतरा)

नारंगी (संतरा) Orange

Citrus reticulata · Rutaceae (जम्बीर कुल)

संस्कृत: नागरङ्ग

फलदारNursery में उपलब्ध

नारंगी (संतरा, मैंडरिन) आसानी से छिलने वाला, मीठा-खट्टा, रसीला फल है। विटामिन C से भरपूर होने के कारण सर्दियों में यह रोग-प्रतिरोधक क्षमता का सबसे अच्छा प्राकृतिक स्रोत है। इसके सूखे छिलके भी दवा और सौंदर्य में काम आते हैं।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल, छिलका, फूल
आयुर्वेदिक गुण
रस: मधुर, अम्ल · गुण: गुरु · तासीर: गर्म (कुछ ग्रंथों में ठंडी)
दोषों पर असर
वात को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • संतरे का रस बुखार, कमज़ोरी और भूख न लगने में दिया जाता है।
  • विटामिन C से भरपूर होने से सर्दी-ज़ुकाम में रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।
  • सूखे छिलके का चूर्ण बेसन/दही में मिलाकर चेहरे पर उबटन की तरह लगाया जाता है।
  • छिलके की खुशबू जी मिचलाने में राहत देती है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, अच्छी निकासी वाली मिट्टी; जलभराव से बचाएँ। बरसात या फरवरी–मार्च में कलमी पौधा लगाएँ; 3–4 साल में फल।

नारियल

नारियल Coconut

Cocos nucifera · Arecaceae (ताल कुल)

संस्कृत: नारिकेल, लाङ्गली

फलदारNursery में उपलब्ध

नारियल को 'कल्पवृक्ष' कहा जाता है, क्योंकि इसका हर भाग काम आता है। पूजा में नारियल (श्रीफल) चढ़ाए बिना कोई शुभ काम पूरा नहीं माना जाता। आयुर्वेद में कच्चे नारियल का पानी सबसे अच्छा प्राकृतिक ठंडा और पौष्टिक पेय बताया गया है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
पानी, गिरी (मलाई/खोपरा), तेल, जटा, फूल
आयुर्वेदिक गुण
रस: मधुर · गुण: गुरु, स्निग्ध · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
वात और पित्त को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • नारियल पानी गर्मी, लू, दस्त और उल्टी के बाद शरीर में पानी और नमक की कमी पूरी करता है।
  • नारियल तेल बालों, रूखी त्वचा, फटी एड़ियों और बच्चों की मालिश में लगाया जाता है।
  • गिरी पौष्टिक है; पेट की जलन और एसिडिटी में कच्ची गिरी खाई जाती है।
  • जटा से रस्सी, पायदान और गमलों की कोकोपीट बनती है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, भरपूर पानी, रेतीली-दोमट मिट्टी। बरसात में लगाएँ। बौनी (ड्वार्फ) किस्म बिहार में 4–5 साल में फल देती है; पाले से छोटे पौधे बचाएँ।

सावधानी: किडनी के मरीज़ पोटैशियम के कारण नारियल पानी डॉक्टर से पूछकर ही लें।

नाशपाती

नाशपाती Pear

Pyrus pyrifolia / Pyrus communis · Rosaceae (गुलाब कुल)

संस्कृत: अमृतफल (कुछ ग्रंथों में), टङ्क

फलदारNursery में उपलब्ध

नाशपाती सेब परिवार का फल है, जिसका रसीला, कुरकुरा गूदा रेशे और पानी से भरपूर होता है। बिहार के मैदानी इलाकों के लिए कम ठंड चाहने वाली 'पत्थर नाशपाती' (रेत नाशपाती, Pyrus pyrifolia) किस्में ठीक रहती हैं, जो जुलाई–अगस्त में पकती हैं। यह हल्का, पचने में आसान फल है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल

पारंपरिक उपयोग

  • रेशे से भरपूर होने से कब्ज़ में मदद करता है।
  • रसीला फल गर्मी में प्यास बुझाता है और शरीर में पानी की कमी पूरी करता है।
  • कम कैलोरी होने से वज़न का ध्यान रखने वालों के लिए अच्छा फल।
  • पकाकर या उबालकर बच्चों और बुज़ुर्गों को आसानी से दिया जा सकता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, अच्छी निकासी वाली मिट्टी। दिसंबर–फरवरी (पत्ते झड़ने के समय) लगाएँ। सर्दी में पत्ते गिर जाते हैं; हर साल हल्की छँटाई करें। 3–4 साल में फल।

निर्गुण्डी

निर्गुण्डी Nirgundi

Vitex negundo · Lamiaceae (तुलसी कुल)

संस्कृत: निर्गुण्डी, सिन्दुवार, शेफाली (कुछ ग्रंथों में)

जड़ी-बूटीNursery में उपलब्ध

निर्गुण्डी (सम्हालू) 2–4 मीटर की झाड़ी है, जिसके पत्ते हाथ की उँगलियों की तरह पाँच पत्रकों में बँटे होते हैं और नीचे से सफ़ेद-भूरे होते हैं। इस पर हल्के नीले-बैंगनी फूलों की मंजरियाँ आती हैं। संस्कृत में कहा गया है कि यह शरीर को रोगों से बचाती है; आयुर्वेद में यह दर्द और सूजन की प्रमुख औषधि है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
पत्ते (मुख्य), जड़, बीज, फूल
आयुर्वेदिक गुण
रस: कटु, तिक्त, कषाय · गुण: लघु, रूक्ष · तासीर: गर्म
दोषों पर असर
कफ और वात को शांत करती है।

पारंपरिक उपयोग

  • पत्तों को पानी में उबालकर उसकी भाप से सेंकना या पत्तों की गरम पोटली से जोड़ों के दर्द और सूजन में राहत ली जाती है।
  • निर्गुण्डी तेल कमर दर्द, घुटने के दर्द और मोच में मालिश के लिए प्रसिद्ध है।
  • पत्तों की भाप सर्दी, बंद नाक और सिरदर्द में ली जाती है।
  • सूखे पत्ते अनाज के भंडार में रखने से कीड़े दूर रहते हैं।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, किसी भी मिट्टी में; सूखा सह लेती है। बरसात में कलम या पौधा लगाएँ। बाड़ के रूप में भी लगा सकते हैं।

सावधानी: गर्भावस्था में अंदरूनी सेवन न करें।

नींबू

नींबू Lemon

Citrus limon / Citrus aurantiifolia (कागज़ी) · Rutaceae (जम्बीर कुल)

संस्कृत: निम्बूक, जम्बीर

फलदारNursery में उपलब्ध

नींबू हर रसोई का ज़रूरी फल है, जो भोजन का स्वाद, पाचन और विटामिन C तीनों बढ़ाता है। खट्टा होते हुए भी आयुर्वेद में इसे भूख बढ़ाने वाला, अरुचि दूर करने वाला और उल्टी रोकने वाला बताया गया है। कागज़ी, हज़ारा और गागर नींबू बिहार में बहुत लगाए जाते हैं।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल का रस, छिलका, पत्ते
आयुर्वेदिक गुण
रस: अम्ल · गुण: लघु, तीक्ष्ण · तासीर: गर्म
दोषों पर असर
वात और कफ को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • गुनगुने पानी में नींबू और शहद लेना पाचन और कब्ज़ के लिए प्रचलित घरेलू उपाय है।
  • शिकंजी (नींबू, नमक, चीनी, पानी) लू, दस्त और गर्मी में पानी की कमी में दी जाती है।
  • जी मिचलाने और उल्टी में नींबू सूँघना या चूसना राहत देता है।
  • विटामिन C से रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है; अचार हर मौसम में काम आता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, अच्छी निकासी वाली मिट्टी; जलभराव से बचाएँ। बरसात या फरवरी–मार्च में लगाएँ। गमले में भी अच्छा फलता है; साल में दो-तीन बार फल।

सावधानी: दाँतों की संवेदनशीलता और एसिडिटी वाले रस को पानी में मिलाकर ही लें।

किस्में: Kagzi Nimbu ₹130 · Hazara Nimbu ₹130 · Seedless Lemon ₹185 · Gagar Nimbu ₹130

नीम

नीम Neem

Azadirachta indica · Meliaceae (निम्ब कुल)

संस्कृत: निम्ब, अरिष्ट, पिचुमर्द

वृक्षNursery में उपलब्ध

नीम को 'गाँव का दवाखाना' कहा जाता है। यह सूखे में भी हरा रहने वाला, घनी छाया और साफ़ हवा देने वाला पेड़ है। आयुर्वेद में इसका संस्कृत नाम 'अरिष्ट' (रोग से मुक्त करने वाला) है और यह त्वचा रोग, खून की शुद्धि और कीटनाशक के रूप में सबसे प्रसिद्ध है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
पत्ते, छाल, टहनी (दातून), फूल, फल (निंबोली), बीज का तेल
आयुर्वेदिक गुण
रस: तिक्त, कषाय · गुण: लघु, रूक्ष · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
कफ और पित्त को शांत करता है, वात बढ़ा सकता है।

पारंपरिक उपयोग

  • नीम की दातून से दाँत और मसूड़े मज़बूत रहते हैं — यह भारत की सदियों पुरानी परंपरा है।
  • नीम के पत्तों को उबालकर उस पानी से नहाने से खुजली, फोड़े-फुंसी और चर्म रोगों में आराम मिलता है।
  • चैत्र में नीम की कोमल पत्तियाँ और फूल खाने की परंपरा खून साफ़ करने और मौसम बदलने पर बीमारी से बचाव के लिए है।
  • नीम तेल और खली खेती में जैविक कीटनाशक और खाद के रूप में उपयोग होते हैं।
  • सूखे पत्ते किताबों, कपड़ों और अनाज में रखने से कीड़े नहीं लगते।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, किसी भी मिट्टी में; सूखा और गर्मी सह लेता है। बरसात में लगाएँ। तेज़ी से बढ़ता है; घर की नींव से 4–5 मीटर दूर लगाएँ।

सावधानी: नीम का तेल खाने की चीज़ नहीं है — बच्चों को कभी न दें। गर्भावस्था में और गर्भ की योजना बनाते समय नीम का अंदरूनी सेवन न करें।

पपीता

पपीता Papaya

Carica papaya · Caricaceae

संस्कृत: एरण्डकर्कटी, मधुकर्कटी

फलदारNursery में उपलब्ध

पपीता सबसे जल्दी फल देने वाला पेड़ है — 8–10 महीने में ही फल आ जाते हैं। पका पपीता पाचन के लिए सबसे अच्छे फलों में है, क्योंकि इसमें 'पपेन' नाम का प्राकृतिक पाचक तत्व होता है। आयुर्वेद ग्रंथों में यह बाद में शामिल हुआ, पर लोक-चिकित्सा में बहुत लोकप्रिय है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल (कच्चा व पका), पत्ते, बीज, दूध
आयुर्वेदिक गुण
पका फल — रस: मधुर · तासीर: गर्म
दोषों पर असर
वात और कफ को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • पका पपीता सुबह खाने से पाचन और कब्ज़ में बहुत आराम मिलता है।
  • कच्चे पपीते की सब्ज़ी और कच्चा पपीता मांस को मुलायम करने में उपयोग होता है।
  • पत्तों का रस डेंगू में प्लेटलेट्स के लिए लोक-परंपरा में दिया जाता है (इलाज डॉक्टर की देखरेख में ही करें)।
  • पके पपीते का गूदा चेहरे पर लगाने से त्वचा साफ़ होती है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, अच्छी निकासी वाली मिट्टी; जलभराव में तुरंत सड़ जाता है। फरवरी–मार्च या जून–सितंबर में लगाएँ। रेड लेडी जैसी किस्में हर पौधे पर फल देती हैं; 2–3 साल बाद नया पौधा लगाएँ।

सावधानी: गर्भावस्था में कच्चा या अधपका पपीता बिल्कुल न खाएँ — इसका दूध गर्भाशय पर असर करता है।

पलाश (ढाक)

पलाश (ढाक) Palash (Flame of the Forest)

Butea monosperma · Fabaceae (शिम्बी कुल)

संस्कृत: पलाश, किंशुक, ब्रह्मवृक्ष

वृक्षNursery में उपलब्ध

फागुन में जब पलाश के पत्ते झड़ जाते हैं और पूरा पेड़ नारंगी-लाल फूलों से भर जाता है, तो इसे 'जंगल की आग' कहते हैं। यह झारखंड का राज्य पुष्प है। इसके फूलों से पारंपरिक होली का केसरिया रंग बनता है और तीन पत्तों वाली टहनी ब्रह्मा-विष्णु-महेश का प्रतीक मानी जाती है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फूल, बीज, छाल, गोंद (कमरकस), पत्ते
आयुर्वेदिक गुण
रस: कटु, तिक्त, कषाय · गुण: लघु, रूक्ष · तासीर: गर्म (बीज), फूल ठंडे
दोषों पर असर
कफ और वात को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • फूलों को पानी में भिगोकर प्राकृतिक, त्वचा के लिए सुरक्षित होली का रंग बनाया जाता है।
  • आयुर्वेद में बीजों का प्रयोग पेट के कीड़ों (कृमि) में, वैद्य की देखरेख में किया जाता है।
  • फूलों का पानी पेशाब की जलन और गर्मी में ठंडक के लिए लोक-परंपरा में दिया जाता है।
  • गोंद (कमरकस) प्रसूता के लड्डुओं और दस्त में उपयोग होता है।
  • पत्तों से पत्तल-दोने बनते हैं; लकड़ी यज्ञ और उपनयन में पवित्र मानी जाती है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, सूखी, पथरीली या खराब मिट्टी भी चलती है। बरसात में लगाएँ। धीरे बढ़ता है; 5–6 साल में फूल।

सावधानी: बीज तेज़ असर वाले हैं — बिना वैद्य की सलाह के न लें; गर्भावस्था में बिल्कुल नहीं।

पान

पान Paan (Betel Leaf)

Piper betle · Piperaceae (पिप्पली कुल)

संस्कृत: ताम्बूलवल्ली, नागवल्ली

लता / बेलNursery में उपलब्ध

पान दिल के आकार के चमकीले, सुगंधित पत्तों वाली बेल है। भोजन के बाद पान खाना, पूजा में पान का पत्ता चढ़ाना और मेहमान को पान देना भारतीय संस्कृति का हिस्सा है। बिहार का मगही पान अपनी कोमलता और स्वाद के लिए GI टैग पा चुका है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
पत्ते, जड़
आयुर्वेदिक गुण
रस: कटु, तिक्त · गुण: लघु, तीक्ष्ण · तासीर: गर्म
दोषों पर असर
कफ और वात को शांत करता है, पित्त बढ़ाता है।

पारंपरिक उपयोग

  • भोजन के बाद सादा पान (बिना तंबाकू-सुपारी के) पाचन और मुँह की ताज़गी के लिए खाया जाता है।
  • सरसों के तेल में गरम किया पान का पत्ता छाती पर रखने से बच्चों की खाँसी-जकड़न में आराम की लोक-परंपरा है।
  • पत्ते का रस और शहद खाँसी में घरेलू उपाय के रूप में दिया जाता है।
  • पूजा, कलश स्थापना और शुभ कार्यों में पान का पत्ता अनिवार्य है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

हल्की छाँव, नमी और नम पर अच्छी निकासी वाली मिट्टी; तेज़ धूप और लू से बचाएँ। बरसात में तने की कलम लगाएँ; दीवार, जाली या डंडे पर चढ़ाएँ। गमले में भी अच्छा बढ़ता है।

सावधानी: पान के साथ तंबाकू, गुटखा या ज़्यादा सुपारी खाने से मुँह का कैंसर होता है — सादा पान ही लें।

पीपल

पीपल Peepal

Ficus religiosa · Moraceae (वट कुल)

संस्कृत: अश्वत्थ, बोधिवृक्ष, चलपत्र

वृक्षNursery में उपलब्ध

पीपल भारत का सबसे पवित्र पेड़ है — गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है 'वृक्षों में मैं अश्वत्थ हूँ', और बोधगया में भगवान बुद्ध को इसी के नीचे ज्ञान मिला। इसके दिल के आकार के पत्ते लंबी नुकीली पूँछ वाले होते हैं और हल्की हवा में भी हिलते रहते हैं। यह सैकड़ों साल जीता है और खूब छाया देता है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
छाल, पत्ते, फल, कोमल टहनियाँ, दूध
आयुर्वेदिक गुण
रस: कषाय, मधुर · गुण: गुरु, रूक्ष · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
कफ और पित्त को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • कसैली छाल का काढ़ा मुँह के छालों, दस्त और घाव धोने में पारंपरिक रूप से उपयोग होता है।
  • छाल और पत्तों का प्रयोग आयुर्वेद में त्वचा रोग और खून की गर्मी (रक्त-पित्त) में बताया गया है।
  • सूखे फलों का चूर्ण लोक-परंपरा में दमा और कमज़ोरी में दिया जाता है।
  • शनिवार को पीपल पूजा, जल चढ़ाना और परिक्रमा की परंपरा है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, किसी भी मिट्टी में। बरसात में लगाएँ। बहुत बड़ा पेड़ बनता है — घर, दीवार और पाइप से कम से कम 10 मीटर दूर, मंदिर, चौपाल या खुली जगह में लगाएँ।

सावधानी: दीवारों और छत की दरारों में उग आए पीपल को छोटे में ही हटा दें, वरना इमारत को नुकसान होता है।

पुत्रजीवक Putranjiva

Putranjiva roxburghii (Drypetes roxburghii) · Putranjivaceae

संस्कृत: पुत्रजीवक, गर्भकर

वृक्षNursery में उपलब्ध

पुत्रजीवक (जियापोता) एक सदाबहार, घना, झुकी शाखाओं वाला सुंदर पेड़ है, जिसके चमकीले गहरे हरे पत्ते होते हैं। पुराने समय में इसके बीजों की माला बच्चों को नज़र और बीमारी से बचाने के लिए पहनाई जाती थी — इसीलिए नाम 'पुत्र-जीवक' पड़ा। आयुर्वेद में यह स्त्रियों के गर्भाशय-स्वास्थ्य से जुड़े योगों में उपयोग होता है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
बीज, पत्ते, फल

पारंपरिक उपयोग

  • आयुर्वेद में बीजों का प्रयोग स्त्री-रोग और गर्भाशय को बल देने वाले योगों में वैद्य द्वारा किया जाता है।
  • पत्तों और फलों का काढ़ा लोक-परंपरा में सर्दी-ज़ुकाम और बुखार में दिया जाता है।
  • बीजों की माला पारंपरिक रूप से बच्चों को पहनाई जाती थी।
  • घना सदाबहार होने से सड़क और बगीचे में छाया और हरियाली के लिए अच्छा पेड़।

कैसे लगाएँ और देखभाल

धूप या हल्की छाँव, सामान्य उपजाऊ मिट्टी। बरसात में लगाएँ। धीरे-धीरे बढ़ता है; घना और साफ़-सुथरा पेड़ बनता है।

सावधानी: संतान से जुड़ी किसी समस्या में ख़ुद इलाज न करें — डॉक्टर से जाँच कराएँ।

पुदीना

पुदीना Mint (Pudina)

Mentha arvensis / Mentha spicata · Lamiaceae (तुलसी कुल)

संस्कृत: पूतिहा, रोचनी

जड़ी-बूटीNursery में उपलब्ध

पुदीना ज़मीन पर फैलने वाला, बहुत खुशबूदार पत्तों वाला छोटा पौधा है। इसकी चटनी, रायता और शिकंजी गर्मियों की जान हैं। इसके तेल 'मेंथॉल' से बाम, टूथपेस्ट और खाँसी की गोलियाँ बनती हैं।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
पत्ते (मुख्य), पूरा पौधा
आयुर्वेदिक गुण
रस: कटु · गुण: लघु, रूक्ष · तासीर: गर्म (स्पर्श में ठंडक देने वाला)
दोषों पर असर
कफ और वात को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • पुदीने की चटनी और पत्ते भोजन के साथ अपच, गैस और जी मिचलाने में राहत देते हैं।
  • गर्मी में पुदीने का शरबत और आम पना लू से बचाव में पिया जाता है।
  • पत्तों की भाप सर्दी और बंद नाक में ली जाती है।
  • पत्ते पीसकर लगाने से मच्छर-कीड़े के काटे पर ठंडक मिलती है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

धूप या हल्की छाँव, नम मिट्टी, नियमित पानी। फरवरी–मार्च या अक्टूबर में बाज़ार की डंडी (जड़ वाली) भी लगा दें तो उग जाती है। ज़मीन में तेज़ी से फैलता है, इसलिए चौड़े गमले में लगाना अच्छा है।

सावधानी: एसिड रिफ्लक्स (सीने में जलन) वाले ज़्यादा पुदीना न लें। पुदीने का तेल छोटे बच्चों की नाक पर न लगाएँ।

किस्में: Pudina (Mint) ₹60 · Mentha (Peppermint) ₹60

फालसा

फालसा Falsa

Grewia asiatica · Malvaceae

संस्कृत: परूषक

फलदारNursery में उपलब्ध

फालसा एक झाड़ीनुमा छोटा पेड़ है, जिस पर मई–जून में मटर जितने छोटे, बैंगनी-काले, खट्टे-मीठे फल गुच्छों में लगते हैं। इसका शरबत उत्तर भारत में गर्मी का सबसे लोकप्रिय ठंडा पेय है। आयुर्वेद में पका फालसा ठंडक देने वाला, प्यास और जलन मिटाने वाला बताया गया है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल (मुख्य), छाल, पत्ते
आयुर्वेदिक गुण
पका फल — रस: मधुर, अम्ल · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
वात और पित्त को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • फालसे का शरबत लू, ज़्यादा प्यास और पेट की जलन में ठंडक देता है।
  • पका फल हृदय के लिए हितकारी और कमज़ोरी में पौष्टिक माना गया है।
  • छाल का काढ़ा लोक-परंपरा में पेशाब की जलन में दिया जाता है।
  • पत्तों का लेप फोड़े-फुंसी पर लगाया जाता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, किसी भी मिट्टी में; सूखा सह लेता है। बरसात या फरवरी में लगाएँ। हर साल जनवरी में ज़मीन से 1 मीटर ऊपर छँटाई करें, तो नई टहनियों पर ज़्यादा फल आते हैं। 2 साल में फल।

बाँस Bamboo

Bambusa vulgaris / Bambusa arundinacea · Poaceae (तृण कुल)

संस्कृत: वंश, वेणु, त्वक्सार

वृक्षNursery में उपलब्ध

बाँस दुनिया की सबसे तेज़ बढ़ने वाली घास है — कुछ किस्में एक दिन में कई सेंटीमीटर बढ़ जाती हैं। इसका उपयोग घर, सीढ़ी, टोकरी, सूप-डाला से लेकर छठ पूजा तक हर जगह होता है। आयुर्वेद का 'वंशलोचन' (तबाशीर), जो सितोपलादि चूर्ण में डलता है, बाँस की गाँठों के अंदर बनता है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
वंशलोचन (बाँस के अंदर जमा सफ़ेद पदार्थ), कोमल कोपलें, पत्ते, जड़
आयुर्वेदिक गुण
वंशलोचन — रस: मधुर, कषाय · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
वंशलोचन पित्त और कफ को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • वंशलोचन वाला सितोपलादि चूर्ण खाँसी, सर्दी और कमज़ोरी में आयुर्वेद का प्रसिद्ध योग है।
  • कोमल बाँस की कोपलों (करील) की सब्ज़ी और अचार उत्तर-पूर्व और झारखंड में खाया जाता है।
  • पत्तों का काढ़ा लोक-परंपरा में खाँसी और पशुओं के चारे में उपयोग होता है।
  • छठ का सूप-डाला, टोकरी, घर बनाने और बाड़ लगाने में बाँस अनिवार्य है।
  • तेज़ी से बढ़ने के कारण मिट्टी कटाव रोकने और हरी दीवार (स्क्रीन) बनाने के लिए अच्छा।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, नम मिट्टी। बरसात में प्रकंद या पौधा लगाएँ। गोल्डन बाँस और हेज बाँस बगीचे-बाड़ के लिए; जड़ें फैलती हैं, इसलिए दीवार से दूरी रखें।

सावधानी: कच्ची कोपलें अच्छी तरह उबालकर ही खाएँ; कच्ची खाने पर हानिकारक हैं।

किस्में: Golden Bamboo ₹150 · Hedge Bamboo ₹150

बादाम Almond

Prunus dulcis (असली बादाम) · Rosaceae (गुलाब कुल)

संस्कृत: वाताद, वातवैरी

फलदार

असली बादाम (वाताद) ठंडे, सूखे पहाड़ी इलाकों (कश्मीर, अफ़ग़ानिस्तान, कैलिफ़ोर्निया) का पेड़ है, जिसके फल के अंदर की गिरी बादाम है। आयुर्वेद में इसे दिमाग़ और शरीर को बल देने वाला मेवा माना गया है। बिहार के मैदान में असली बादाम पर फल नहीं आते; यहाँ 'देसी बादाम' (Terminalia catappa) नाम का अलग छायादार पेड़ उगता है, जिसकी गिरी भी खाई जाती है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
बीज (गिरी), तेल
आयुर्वेदिक गुण
रस: मधुर · गुण: गुरु, स्निग्ध · तासीर: गर्म
दोषों पर असर
वात को शांत करता है; पित्त-कफ बढ़ा सकता है।

पारंपरिक उपयोग

  • रात भर भिगोकर छिले हुए बादाम सुबह खाना दिमाग़ और याददाश्त के लिए परंपरा से प्रचलित है।
  • बादाम दूध (बादाम पीसकर दूध में) कमज़ोरी और दुबलेपन में पौष्टिक पेय है।
  • बादाम रोगन (तेल) नाक में डालने, सिर और शरीर की मालिश, और बच्चों की मालिश में उपयोग होता है।
  • त्वचा की रूखापन में बादाम तेल लगाया जाता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

असली बादाम को ठंडी सर्दी चाहिए — बिहार में यह फल नहीं देता। हमारे पास 'देसी बादाम' का पेड़ मिलता है, जो धूप में तेज़ी से बढ़ता है, घनी छाया देता है और जिसके फल की गिरी भी खाई जाती है।

सावधानी: कड़वे बादाम (जंगली किस्म) न खाएँ — उनमें ज़हरीला तत्व होता है। मेवे से एलर्जी वाले सावधान रहें।

Nursery में 'देसी बादाम' (Terminalia catappa) मिलता है, जो असली बादाम से अलग पेड़ है।

बेर

बेर Ber (Jujube)

Ziziphus mauritiana · Rhamnaceae

संस्कृत: बदर, कोल, कर्कन्धु

फलदारNursery में उपलब्ध

बेर काँटेदार, सूखा सहने वाला पेड़ है, जो सर्दियों के अंत (जनवरी–मार्च) में मीठे-खट्टे फलों से लद जाता है। शबरी के बेर की कथा से यह फल भक्ति का प्रतीक है, और बसंत पंचमी व शिवरात्रि पर बेर चढ़ाए जाते हैं। थाई एप्पल बेर जैसी नई किस्में सेब जितने बड़े, मीठे फल देती हैं।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल, बीज की गिरी, पत्ते, छाल, जड़
आयुर्वेदिक गुण
पका फल — रस: मधुर, अम्ल · गुण: गुरु, स्निग्ध · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
वात और पित्त को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • पका बेर पौष्टिक, विटामिन C वाला फल है और गर्मी-प्यास में ठंडक देता है।
  • बीज की गिरी आयुर्वेद में नींद और प्यास में उपयोग होती है।
  • पत्तों का लेप फोड़े-फुंसी और बालों की रूसी में लोक-परंपरा में लगाया जाता है।
  • सूखे बेर का चूर्ण और चटनी पाचन के लिए।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, किसी भी मिट्टी में — खारी और सूखी ज़मीन भी। बरसात या फरवरी–मार्च में कलमी पौधा लगाएँ; एक साल में ही फल देने लगता है। हर साल मई में छँटाई करें।

सावधानी: कच्चे बेर ज़्यादा खाने से गले में ख़राश और खाँसी हो सकती है।

बेल

बेल Bael

Aegle marmelos · Rutaceae (जम्बीर कुल)

संस्कृत: बिल्व, शाण्डिल्य, श्रीफल

फलदारNursery में उपलब्ध

बेल भगवान शिव का सबसे प्रिय पेड़ है — तीन पत्तों वाला बेलपत्र शिवलिंग पर चढ़ाया जाता है। इसका सख़्त खोल वाला फल अंदर से पीला, खुशबूदार और गूदेदार होता है। आयुर्वेद में कच्चा बेल दस्त-पेचिश की सबसे प्रसिद्ध दवा है और इसकी जड़ दशमूल में शामिल है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल (कच्चा व पका), पत्ते (बेलपत्र), जड़ (दशमूल में), छाल
आयुर्वेदिक गुण
रस: कषाय, तिक्त · गुण: लघु, रूक्ष · तासीर: गर्म (कच्चा फल); पका फल मधुर, गुरु
दोषों पर असर
कफ और वात को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • गर्मी में पके बेल का शरबत लू से बचाव, पेट की ठंडक और कब्ज़ में पिया जाता है।
  • कच्चे बेल का गूदा या बेलगिरी चूर्ण दस्त, पेचिश और आँतों की कमज़ोरी में पारंपरिक रूप से दिया जाता है।
  • बेलपत्र का रस लोक-परंपरा में शुगर संतुलन के लिए लिया जाता है।
  • बेलपत्र सावन और शिवरात्रि में शिव पूजा का अनिवार्य अंग है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, किसी भी मिट्टी में — सूखी और खारी भी। बरसात में कलमी पौधा लगाएँ; 4–5 साल में फल। बहुत कम देखभाल चाहिए।

सावधानी: कच्चा बेल और बेलगिरी कब्ज़ कर सकते हैं, इसलिए कब्ज़ में पका बेल ही लें। शुगर की दवा के साथ बेलपत्र का रस नियमित लेना हो तो पहले डॉक्टर से पूछें।

बेली (मोगरा)

बेली (मोगरा) Beli (Mogra)

Jasminum sambac · Oleaceae (पारिजात कुल)

संस्कृत: मल्लिका, वार्षिकी, भृङ्गानन्दा

फूलNursery में उपलब्ध

बेली (मोगरा, बेला) गर्मी की शामों की खुशबू है — इसके सफ़ेद, मोटी पंखुड़ियों वाले फूल अप्रैल से सितंबर तक खिलते हैं। गजरा, माला और पूजा में सबसे ज़्यादा इसी के फूल लगते हैं। इससे बना इत्र और 'जैस्मिन टी' दुनिया भर में प्रसिद्ध है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फूल, पत्ते, जड़
आयुर्वेदिक गुण
रस: तिक्त, कटु · गुण: लघु · तासीर: गर्म (कुछ ग्रंथों में ठंडी)
दोषों पर असर
कफ और पित्त को शांत करती है।

पारंपरिक उपयोग

  • फूलों की खुशबू मन को शांत करती है; बिस्तर के पास रखने से अच्छी नींद की परंपरा है।
  • पत्तों का काढ़ा मुँह के छालों में कुल्ले के लिए।
  • फूलों का लेप आँखों की जलन और त्वचा पर ठंडक के लिए लोक-परंपरा में।
  • स्तनपान बंद कराने के समय फूल बाँधने की दक्षिण भारतीय परंपरा है।
  • गजरा, माला, इत्र और चाय में फूलों का उपयोग।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, अच्छी निकासी वाली मिट्टी, नियमित पानी। फरवरी–मार्च या बरसात में लगाएँ। फरवरी में छँटाई करें और फूलों के मौसम में हर महीने खाद दें।

ब्राह्मी

ब्राह्मी Brahmi

Bacopa monnieri · Plantaginaceae

संस्कृत: ब्राह्मी, सरस्वती, जलनिम्ब

जड़ी-बूटीNursery में उपलब्ध

ब्राह्मी नमी वाली जगह पर ज़मीन पर फैलने वाली, छोटे मोटे पत्तों और सफ़ेद-हल्के बैंगनी फूलों वाली जड़ी है। इसका नाम ब्रह्मा और सरस्वती से जुड़ा है, क्योंकि आयुर्वेद में यह बुद्धि, याददाश्त और एकाग्रता की सबसे प्रसिद्ध (मेध्य) औषधि है। (कुछ जगह मण्डूकपर्णी/सेंटेला को भी ब्राह्मी कहते हैं, जो अलग पौधा है।)

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
पूरा पौधा (पंचांग)
आयुर्वेदिक गुण
रस: तिक्त, कषाय, मधुर · गुण: लघु · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
कफ और वात को शांत करती है, पित्त भी संतुलित करती है।

पारंपरिक उपयोग

  • ब्राह्मी का रस या चूर्ण पढ़ने वाले बच्चों और बुज़ुर्गों में याददाश्त के लिए परंपरा से दिया जाता है।
  • तनाव, बेचैनी और अनिद्रा में मन शांत करने के लिए इसका प्रयोग होता है।
  • ब्राह्मी तेल सिर की मालिश, बालों और ठंडक के लिए लगाया जाता है।
  • आवाज़ साफ़ करने और गले के लिए भी इसका प्रयोग बताया गया है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

धूप या हल्की छाँव और हमेशा गीली मिट्टी — बिना छेद वाले टब, तालाब के किनारे या ट्रे में पानी भरकर रखें। किसी भी मौसम में कलम से लग जाती है; बहुत तेज़ी से फैलती है।

सावधानी: थायरॉइड की दवा या नींद की दवा के साथ डॉक्टर से पूछकर लें; कुछ लोगों को पेट में गड़बड़ होती है।

मुलेठी Mulethi (Liquorice)

Glycyrrhiza glabra · Fabaceae (शिम्बी कुल)

संस्कृत: यष्टिमधु, मधुयष्टि, क्लीतक

जड़ी-बूटीNursery में उपलब्ध

मुलेठी 1–1.5 मीटर ऊँची झाड़ी है, जिसकी जड़ चीनी से भी कई गुना मीठी होती है — इसीलिए संस्कृत में इसे 'यष्टि-मधु' (मीठी लकड़ी) कहते हैं। आयुर्वेद में यह गले, आवाज़ और खाँसी की सबसे प्रसिद्ध औषधि है। बाज़ार में सूखी डंडियाँ मिलती हैं, जिन्हें चूसा जाता है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
जड़ (मुख्य)
आयुर्वेदिक गुण
रस: मधुर · गुण: गुरु, स्निग्ध · तासीर: ठंडी · विपाक: मधुर
दोषों पर असर
वात और पित्त को शांत करती है।

पारंपरिक उपयोग

  • मुलेठी की डंडी चूसने या चूर्ण शहद के साथ लेने से गले की ख़राश, सूखी खाँसी और बैठी आवाज़ में आराम मिलता है।
  • गायक और वक्ता आवाज़ साफ़ रखने के लिए मुलेठी का उपयोग करते रहे हैं।
  • पेट की जलन, एसिडिटी और मुँह के छालों में आयुर्वेद में इसका प्रयोग होता है।
  • त्वचा की चमक के लिए उबटन और फेस-पैक में मुलेठी चूर्ण डाला जाता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, गहरी, रेतीली-दोमट, अच्छी निकासी वाली मिट्टी। फरवरी–मार्च में जड़ के टुकड़े या पौधा लगाएँ; जलभराव से बचाएँ। जड़ तैयार होने में 2–3 साल लगते हैं। गहरे गमले में भी उगती है।

सावधानी: ब्लड प्रेशर, दिल या किडनी के मरीज़ और गर्भवती महिलाएँ लंबे समय तक न लें — इससे BP बढ़ सकता है और पोटैशियम घट सकता है।

मेहंदी Mehandi (Henna)

Lawsonia inermis · Lythraceae

संस्कृत: मदयन्तिका, मेन्धिका, नखरञ्जनी

जड़ी-बूटीNursery में उपलब्ध

मेहंदी एक घनी, झाड़ीदार पौधा है, जिसके पत्तों को पीसकर हाथ-पैर रँगने और बालों को रंग देने की परंपरा हज़ारों साल पुरानी है। शादी, तीज और करवाचौथ मेहंदी के बिना अधूरे हैं। इसके छोटे सफ़ेद-क्रीम फूलों की खुशबू बहुत तेज़ होती है और आयुर्वेद में इसके पत्ते ठंडक देने वाले माने गए हैं।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
पत्ते (मुख्य), फूल, बीज, छाल
आयुर्वेदिक गुण
रस: तिक्त, कषाय · गुण: लघु, रूक्ष · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
कफ और पित्त को शांत करती है।

पारंपरिक उपयोग

  • ताज़ा पिसी मेहंदी हाथ-पैरों पर लगाने से रंग के साथ गर्मी और जलन में ठंडक मिलती है।
  • बालों में मेहंदी लगाना प्राकृतिक रंग, कंडीशनर और रूसी कम करने के लिए प्रचलित है।
  • पत्तों का लेप पैरों की जलन, फटी एड़ियों और नाखूनों के फंगस में लगाया जाता है।
  • पत्तों का काढ़ा मुँह के छालों में कुल्ले के लिए लोक-परंपरा में।
  • घनी होने से बगीचे की बाड़ (हेज) के लिए बहुत अच्छी।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, किसी भी मिट्टी में; सूखा सह लेती है। बरसात में पौधा या कलम लगाएँ। बाड़ के लिए 30–45 सेमी दूरी पर लगाकर छँटाई करते रहें।

सावधानी: बाज़ार की 'काली मेहंदी' में मिलाया जाने वाला रसायन (PPD) गंभीर एलर्जी करता है — घर की हरी पत्ती वाली मेहंदी ही सुरक्षित है। G6PD की कमी वाले नवजात शिशुओं को मेहंदी न लगाएँ।

मौसंबी

मौसंबी Mosambi (Sweet Lime)

Citrus limetta · Rutaceae (जम्बीर कुल)

संस्कृत: मधुकर्कटी (कुछ ग्रंथों में)

फलदारNursery में उपलब्ध

मौसंबी हल्की मीठी, कम खट्टी, रसीली नींबू-प्रजाति का फल है। अस्पताल में मरीज़ों को सबसे पहले मौसंबी का जूस ही दिया जाता है, क्योंकि यह हल्का, ठंडक देने वाला और पचने में आसान है। विटामिन C और पानी से भरपूर होने के कारण गर्मी और बुखार में बहुत उपयोगी है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल का रस, छिलका
आयुर्वेदिक गुण
रस: मधुर, हल्का अम्ल · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
पित्त और वात को शांत करती है।

पारंपरिक उपयोग

  • बुखार, बीमारी के बाद कमज़ोरी और भूख न लगने में मौसंबी का जूस दिया जाता है।
  • गर्मी में शरीर में पानी की कमी और थकान दूर करता है।
  • विटामिन C से रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
  • छिलके का सूखा चूर्ण उबटन में डाला जाता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, अच्छी निकासी वाली मिट्टी; जलभराव से बचाएँ। बरसात या फरवरी–मार्च में कलमी पौधा लगाएँ; 3 साल में फल।

सावधानी: जूस को निकालकर तुरंत पिएँ; ज़्यादा देर रखने पर कड़वा हो जाता है।

रंगून क्रीपर (मधुमालती)

रंगून क्रीपर (मधुमालती) Rangoon Creeper (Madhumalti)

Combretum indicum (Quisqualis indica) · Combretaceae

संस्कृत: मधुमालती, रङ्गूनलता

लता / बेलNursery में उपलब्ध

मधुमालती एक तेज़ बढ़ने वाली बेल है, जिसके लटकते गुच्छों में फूल पहले सफ़ेद खिलते हैं, फिर गुलाबी और अंत में गहरे लाल हो जाते हैं — एक ही गुच्छे में तीन रंग। शाम को इसकी मीठी खुशबू पूरे आँगन में फैल जाती है। दक्षिण-पूर्व एशिया की पारंपरिक चिकित्सा में इसके बीज पेट के कीड़ों की दवा रहे हैं।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
बीज, पत्ते, फूल

पारंपरिक उपयोग

  • पारंपरिक चीनी और दक्षिण-पूर्व एशियाई चिकित्सा में भुने बीज पेट के कीड़ों में दिए जाते थे (केवल चिकित्सक द्वारा)।
  • पत्तों का लेप लोक-परंपरा में फोड़ों और सिरदर्द में लगाया जाता है।
  • फूल मधुमक्खियों, तितलियों और शहद खाने वाले पक्षियों को आकर्षित करते हैं।
  • बालकनी, गेट और पर्गोला को ढकने वाली सबसे सुंदर खुशबूदार बेल।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, उपजाऊ मिट्टी, नियमित पानी। बरसात या फरवरी–मार्च में लगाएँ; मज़बूत सहारा दें। मार्च से अक्टूबर तक फूल। हर साल सर्दी के अंत में छँटाई करें।

सावधानी: बीज ज़्यादा खाने से हिचकी, उल्टी और चक्कर आते हैं — बच्चों से दूर रखें।

राखी फूल (कृष्ण कमल)

राखी फूल (कृष्ण कमल) Rakhi Flower (Passion Flower)

Passiflora incarnata / Passiflora caerulea · Passifloraceae

लता / बेलNursery में उपलब्ध

राखी फूल (कृष्ण कमल) एक बेल है, जिसके अनोखे फूल राखी जैसे दिखते हैं — बीच में तीन वर्तिकाएँ, पाँच पुंकेसर और चारों ओर बैंगनी-सफ़ेद धागों का घेरा। लोक-मान्यता में इसमें महाभारत (100 कौरव, 5 पांडव, कृष्ण का सुदर्शन) देखा जाता है। यह दक्षिण अमेरिका से आया है; यूरोप-अमेरिका की हर्बल चिकित्सा में इसके पत्ते नींद और घबराहट के लिए प्रसिद्ध हैं।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
पत्ते, फूल, फल

पारंपरिक उपयोग

  • पत्तों की हल्की चाय पश्चिमी हर्बल परंपरा में बेचैनी, घबराहट और अनिद्रा में ली जाती है।
  • फूल पूजा और सजावट में, विशेषकर कृष्ण पूजा में चढ़ाए जाते हैं।
  • कुछ किस्मों के पके फल (पैशन फ्रूट जैसे) खाने योग्य होते हैं।
  • बालकनी की जाली और बाड़ के लिए सुंदर, तेज़ बढ़ने वाली बेल।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप या हल्की छाँव, अच्छी निकासी वाली मिट्टी। बरसात या फरवरी–मार्च में लगाएँ; जाली का सहारा दें। गर्मी और बरसात में खूब फूलती है।

सावधानी: गर्भावस्था में और नींद/बेचैनी की दवा के साथ इसकी चाय न लें। कच्चे फल न खाएँ।

रुद्राक्ष Rudraksha

Elaeocarpus ganitrus (E. angustifolius) · Elaeocarpaceae

संस्कृत: रुद्राक्ष, शिवाक्ष, भूतनाशन

वृक्षNursery में उपलब्ध

रुद्राक्ष एक ऊँचा सदाबहार पेड़ है, जिसके नीले रंग के फलों के अंदर उभरी धारियों (मुख) वाली गुठली होती है — यही पवित्र रुद्राक्ष है। मान्यता है कि यह भगवान शिव के आँसुओं से उत्पन्न हुआ। यह नेपाल, असम, उत्तराखंड और दक्षिण-पूर्व एशिया के नम इलाकों में स्वाभाविक रूप से उगता है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
बीज (रुद्राक्ष), फल का गूदा, छाल, पत्ते

पारंपरिक उपयोग

  • रुद्राक्ष की माला जप और धारण करने के लिए धार्मिक रूप से सबसे पवित्र मानी जाती है।
  • आयुर्वेद और लोक-परंपरा में रुद्राक्ष को पानी में भिगोकर वह पानी BP और मन की बेचैनी में पीने की बात कही जाती है (यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं है)।
  • फल का गूदा लोक-परंपरा में सिरदर्द और मिर्गी जैसे दौरों में दिया जाता था।
  • मंदिर परिसर और बड़े बगीचे में शुभ पेड़ के रूप में लगाया जाता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

नम, गर्म जलवायु, हल्की छाँव से धूप, उपजाऊ नम मिट्टी। बरसात में लगाएँ और गर्मी-लू में नियमित पानी दें। बिहार में पेड़ बढ़ जाता है, पर फल आने में 7–10 साल लगते हैं और कम आते हैं।

सावधानी: BP या कोई बीमारी हो तो रुद्राक्ष के पानी पर निर्भर न रहें — डॉक्टर की दवा जारी रखें।

लाजवंती (छुईमुई)

लाजवंती (छुईमुई) Lajwanti (Touch-me-not)

Mimosa pudica · Fabaceae (शिम्बी कुल)

संस्कृत: लज्जालु, समङ्गा, नमस्कारी

जड़ी-बूटीNursery में उपलब्ध

छुईमुई छूते ही अपने पत्ते बंद कर लेती है, मानो शर्मा गई हो — इसीलिए इसे लाजवंती और 'लज्जालु' कहते हैं। इस पर गुलाबी, रोएँदार गेंद जैसे छोटे फूल आते हैं। बच्चों के लिए यह सबसे मज़ेदार पौधा है और आयुर्वेद में घाव भरने और खून रोकने वाली (संधानीय) औषधि है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
पूरा पौधा, जड़, पत्ते
आयुर्वेदिक गुण
रस: तिक्त, कषाय · गुण: लघु, रूक्ष · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
कफ और पित्त को शांत करती है।

पारंपरिक उपयोग

  • पत्तों को पीसकर कटे घाव और खून बहने पर लगाने की लोक-परंपरा है, क्योंकि यह कसैली है।
  • आयुर्वेद में इसका प्रयोग दस्त, खूनी बवासीर और स्त्री रोगों के योगों में होता है।
  • जड़ का काढ़ा लोक-परंपरा में दाँत दर्द और मसूड़ों में कुल्ले के लिए।
  • बच्चों को पौधों की हलचल (स्पर्श-संवेदना) दिखाने के लिए स्कूल-बगीचे का पसंदीदा पौधा।

कैसे लगाएँ और देखभाल

धूप, सामान्य मिट्टी, मध्यम पानी। फरवरी–मार्च या बरसात में बीज/पौधा लगाएँ। गमले में आसानी से उगती है; ज़मीन में फैल सकती है।

सावधानी: तने पर छोटे काँटे होते हैं। गर्भावस्था में अंदरूनी सेवन न करें।

लीची

लीची Litchi

Litchi chinensis · Sapindaceae (अरिष्टक कुल)

फलदारNursery में उपलब्ध

मुज़फ़्फ़रपुर की शाही लीची पूरी दुनिया में मशहूर है और इसे GI टैग मिला है। लाल, खुरदुरे छिलके के अंदर सफ़ेद, रसीला, गुलाब जैसी खुशबू वाला गूदा होता है। यह मूल रूप से चीन का फल है और मई–जून में थोड़े समय के लिए मिलता है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल

पारंपरिक उपयोग

  • गर्मी में रसीला फल प्यास बुझाता है और ऊर्जा देता है।
  • विटामिन C और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होने से रोग-प्रतिरोधक क्षमता के लिए अच्छा।
  • लीची का जूस, शरबत और जैम बनाए जाते हैं।
  • लोक-परंपरा में बीज का चूर्ण पेट दर्द में दिया जाता है (सावधानी से)।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, गहरी, नम, थोड़ी अम्लीय दोमट मिट्टी; उत्तर बिहार की मिट्टी सबसे उपयुक्त है। बरसात में गूटी (एयर लेयरिंग) वाला पौधा लगाएँ; 4–5 साल में फल। फल बनने के समय नियमित पानी दें।

सावधानी: खाली पेट, विशेषकर बच्चों को, कच्ची या अधपकी लीची न खिलाएँ — इससे शुगर बहुत गिर सकती है। बच्चों को रात का खाना खिलाकर ही सोने दें।

किस्में: Litchi Shahi ₹185 · Litchi China ₹185

विदारीकंद Vidarikand

Pueraria tuberosa · Fabaceae (शिम्बी कुल)

संस्कृत: विदारी, क्षीरविदारी, भूमिकूष्माण्ड

लता / बेलNursery में उपलब्ध

विदारीकंद एक बड़ी, लकड़ीनुमा बेल है, जिसकी जड़ में कद्दू जितना बड़ा, अंदर से सफ़ेद-दूधिया कंद बनता है — इसीलिए इसे 'भूमि-कूष्माण्ड' (ज़मीन का कद्दू) कहते हैं। आयुर्वेद में यह बल, वज़न और दूध बढ़ाने वाली प्रमुख रसायन औषधि है। बसंत में इस पर नीले-बैंगनी फूल आते हैं।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
कंद (ज़मीन के नीचे का बड़ा गाँठनुमा भाग)
आयुर्वेदिक गुण
रस: मधुर · गुण: गुरु, स्निग्ध · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
वात और पित्त को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • कंद का चूर्ण दूध के साथ कमज़ोरी, दुबलेपन और थकान में बल बढ़ाने के लिए परंपरा से लिया जाता है।
  • प्रसूता में दूध बढ़ाने (स्तन्यजनन) के लिए आयुर्वेद में इसका प्रयोग होता है।
  • पुरुषों में शक्ति बढ़ाने वाले (वाजीकरण) योगों का प्रमुख घटक है।
  • ठंडक देने वाला होने से पेशाब की जलन में उपयोगी बताया गया है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

धूप, अच्छी निकासी वाली मिट्टी; पेड़ या बाड़ का सहारा चाहिए। बरसात में लगाएँ। कंद बड़ा होने में 2–3 साल लगते हैं।

सावधानी: गुरु (भारी) है — कमज़ोर पाचन वाले कम मात्रा में लें।

विधारा Vidhara (Elephant Creeper)

Argyreia nervosa · Convolvulaceae

संस्कृत: वृद्धदारक, आवेगी, जीर्णदारु

लता / बेल⚠ ज़हरीला / सावधानीNursery में उपलब्ध

विधारा (समुद्र-शोष) एक बड़ी, तेज़ी से फैलने वाली बेल है, जिसके हाथी के कान जैसे बड़े, दिल के आकार के पत्ते नीचे से रेशमी-सफ़ेद होते हैं और बैंगनी-गुलाबी कीप जैसे फूल आते हैं। संस्कृत नाम 'वृद्ध-दारक' का अर्थ है जो बुढ़ापे को दूर करे। आयुर्वेद में यह जोड़ों के दर्द और बल के लिए प्रसिद्ध रसायन है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
जड़ (मुख्य), पत्ते
आयुर्वेदिक गुण
रस: कटु, तिक्त, कषाय · गुण: लघु, स्निग्ध · तासीर: गर्म
दोषों पर असर
कफ और वात को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • जड़ का चूर्ण आयुर्वेद में जोड़ों के दर्द, कमर दर्द और गठिया (आमवात) में प्रयोग होता है।
  • रसायन के रूप में बुढ़ापे की कमज़ोरी और याददाश्त के लिए बताया गया है।
  • पत्तों को गरम करके सूजन और फोड़ों पर बाँधने की लोक-परंपरा है।
  • बड़े पत्तों और फूलों के कारण बाड़ और पेड़ों पर सजावटी बेल।

कैसे लगाएँ और देखभाल

धूप, किसी भी मिट्टी में; बहुत बड़ी बेल बनती है, इसलिए मज़बूत पेड़, दीवार या पर्गोला चाहिए। बरसात में लगाएँ।

सावधानी: इसके बीज खाने से नशा और मतिभ्रम होता है — बीज बिल्कुल न खाएँ। गर्भावस्था में न लें।

शंखपुष्पी Shankhpushpi

Convolvulus prostratus (C. pluricaulis) · Convolvulaceae

संस्कृत: शंखपुष्पी, शंखाह्वा, मंगल्यकुसुमा

जड़ी-बूटीNursery में उपलब्ध

शंखपुष्पी ज़मीन पर फैलने वाली छोटी, रोएँदार जड़ी है, जिस पर शंख के आकार के छोटे सफ़ेद या हल्के गुलाबी फूल आते हैं। आयुर्वेद में ब्राह्मी के साथ यह बुद्धि और याददाश्त बढ़ाने वाली (मेध्य) सबसे प्रसिद्ध औषधि है। बाज़ार में नीले फूल वाली 'विष्णुकांता' (Evolvulus alsinoides) भी शंखपुष्पी नाम से बिकती है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
पूरा पौधा (पंचांग)
आयुर्वेदिक गुण
रस: कषाय, कटु, तिक्त · गुण: स्निग्ध, पिच्छिल · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
तीनों दोषों को शांत करती है, विशेषकर वात-पित्त।

पारंपरिक उपयोग

  • शंखपुष्पी सिरप या चूर्ण छात्रों में याददाश्त और एकाग्रता के लिए परंपरा से दिया जाता है।
  • मन की बेचैनी, तनाव और अनिद्रा में मन को शांत करने के लिए आयुर्वेद में प्रयोग होता है।
  • ठंडक देने वाली होने से सिरदर्द और गर्मी की तकलीफ़ में उपयोगी बताई गई है।
  • बालों के तेल में डाली जाती है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, रेतीली, सूखी, अच्छी निकासी वाली मिट्टी; ज़्यादा पानी नहीं। बरसात में बीज या पौधा लगाएँ; चौड़े गमले या ज़मीन पर फैलने दें।

सावधानी: नींद या BP की दवा ले रहे हों तो डॉक्टर से पूछकर ही लें।

शतावरी

शतावरी Shatavari

Asparagus racemosus · Asparagaceae

संस्कृत: शतावरी, शतमूली, अभीरु, नारायणी

लता / बेलNursery में उपलब्ध

शतावरी सुई जैसी बारीक हरी पत्तियों वाली काँटेदार झाड़ीदार बेल है, जिसकी जड़ में उँगली जैसी दर्जनों सफ़ेद, गूदेदार कंदिल जड़ें होती हैं — इसीलिए नाम 'शत-आवरी/शतमूली' (सौ जड़ों वाली) है। आयुर्वेद में यह स्त्रियों की सबसे प्रसिद्ध रसायन औषधि है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
कंदिल जड़ें (मुख्य)
आयुर्वेदिक गुण
रस: मधुर, तिक्त · गुण: गुरु, स्निग्ध · तासीर: ठंडी · विपाक: मधुर
दोषों पर असर
वात और पित्त को शांत करती है।

पारंपरिक उपयोग

  • शतावरी चूर्ण दूध के साथ प्रसूता में दूध बढ़ाने के लिए परंपरा से दिया जाता है।
  • स्त्रियों में कमज़ोरी, हार्मोन संतुलन और रजोनिवृत्ति की तकलीफ़ों में आयुर्वेद में प्रयोग होता है।
  • ठंडक देने वाली होने से एसिडिटी, पेट के छालों और पेशाब की जलन में उपयोगी बताई गई है।
  • सुंदर पत्तियों के कारण गमले और टोकरी में सजावटी पौधे की तरह भी लगाई जाती है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

धूप या हल्की छाँव, रेतीली-दोमट अच्छी निकासी वाली मिट्टी। बरसात में लगाएँ; गहरा गमला चाहिए। जड़ें 2–3 साल में तैयार होती हैं।

सावधानी: शतावरी से एलर्जी वाले या भारी कफ (बलगम) की तकलीफ़ में न लें।

शमी Shami (Khejri)

Prosopis cineraria · Fabaceae (शिम्बी कुल)

संस्कृत: शमी, सक्तुफला, तुङ्गा

वृक्षNursery में उपलब्ध

शमी (खेजड़ी) रेगिस्तान का कल्पवृक्ष है — बिना पानी के भी हरा रहने वाला काँटेदार पेड़, जो राजस्थान का राज्य वृक्ष है। दशहरे पर शमी पूजा होती है, क्योंकि पांडवों ने अज्ञातवास में अपने शस्त्र इसी पर छिपाए थे। शनिवार को शमी पूजा शनिदेव के लिए शुभ मानी जाती है, और इसकी पत्तियाँ गणेश जी को चढ़ाई जाती हैं।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
छाल, पत्ते, फली (सांगरी), फूल
आयुर्वेदिक गुण
रस: कषाय, तिक्त · गुण: लघु, रूक्ष · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
कफ और पित्त को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • दशहरा, गणेश पूजा और शनिवार की पूजा में शमी पत्र चढ़ाए जाते हैं।
  • कसैली छाल का काढ़ा लोक-परंपरा में दस्त, खाँसी और त्वचा रोगों में दिया जाता है।
  • फलियों (सांगरी) की सब्ज़ी राजस्थान का प्रसिद्ध व्यंजन है।
  • पत्तियाँ पशुओं का पौष्टिक चारा हैं और पेड़ मिट्टी को उपजाऊ बनाता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, रेतीली, सूखी मिट्टी — ज़्यादा पानी और जलभराव से बचाएँ। बरसात में लगाएँ। धीरे बढ़ता है; पूजा के लिए बड़े गमले में भी रखा जाता है।

शरीफ़ा (सीताफल)

शरीफ़ा (सीताफल) Sharifa (Custard Apple)

Annona squamosa · Annonaceae

संस्कृत: सीताफल, गण्डगात्र

फलदारNursery में उपलब्ध

शरीफ़ा (सीताफल) के हरे, उभरी आँखों जैसे खंडों वाले फल के अंदर मलाई जैसा मीठा सफ़ेद गूदा और काले बीज होते हैं। अक्टूबर–नवंबर में मिलने वाला यह फल ऊर्जा, आयरन और रेशे से भरपूर है। पेड़ छोटा और सूखा सहने वाला होता है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल, पत्ते, बीज, जड़
आयुर्वेदिक गुण
रस: मधुर · गुण: गुरु · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
वात और पित्त को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • पका शरीफ़ा कमज़ोरी, थकान और दुबलेपन में पौष्टिक, मीठा फल है।
  • ठंडक देने वाला होने से पित्त की जलन में उपयोगी माना गया है।
  • पत्तों का लेप लोक-परंपरा में फोड़ों पर और पत्ते पीसकर सिर में जूँ भगाने के लिए लगाए जाते हैं।
  • बीजों का चूर्ण पारंपरिक रूप से फसलों पर कीटनाशक के रूप में।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, किसी भी मिट्टी में; सूखा सह लेता है। बरसात में लगाएँ; 3–4 साल में फल। जलभराव से बचाएँ।

सावधानी: बीज ज़हरीले हैं — बीज न तोड़ें, न खाएँ और इसका चूर्ण आँखों से दूर रखें।

शहतूत

शहतूत Mulberry

Morus alba · Moraceae (वट कुल)

संस्कृत: तूद, तूत, ब्रह्मदारु

फलदारNursery में उपलब्ध

शहतूत तेज़ी से बढ़ने वाला पेड़ है, जिसके छोटे, लंबे, काले-बैंगनी या सफ़ेद, बहुत मीठे फल गर्मी की शुरुआत में पकते हैं। इसके पत्ते रेशम के कीड़ों का एकमात्र भोजन हैं, इसलिए रेशम उद्योग की जान है। पके फल ठंडक देने वाले और खून बढ़ाने वाले माने गए हैं।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल, पत्ते, छाल, जड़
आयुर्वेदिक गुण
रस: मधुर, अम्ल · गुण: गुरु · तासीर: ठंडी (पका फल)
दोषों पर असर
वात और पित्त को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • पके शहतूत का शरबत गर्मी, प्यास और गले की ख़राश में ठंडक देता है।
  • फल आयरन और विटामिन से भरपूर हैं; खून की कमी में खाए जाते हैं।
  • पत्तों की चाय शुगर संतुलन के लिए पूर्वी एशिया में प्रचलित है।
  • पत्ते रेशम कीट पालन और पशुओं के चारे में काम आते हैं।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, किसी भी मिट्टी में; बहुत आसानी से कलम से लग जाता है। जनवरी–फरवरी या बरसात में लगाएँ। बड़े गमले में भी फल देता है; छँटाई करके छोटा रख सकते हैं।

सावधानी: कच्चे फल न खाएँ — पेट ख़राब कर सकते हैं।

शीशम

शीशम Shisham

Dalbergia sissoo · Fabaceae (शिम्बी कुल)

संस्कृत: शिंशपा, कृष्णसारा, पिच्छिला

वृक्षNursery में उपलब्ध

शीशम उत्तर भारत का सबसे प्रसिद्ध इमारती लकड़ी का पेड़ है, जिसकी भूरी, मज़बूत, सुंदर धारियों वाली लकड़ी से पलंग, अलमारी और दरवाज़े बनते हैं। इसके गोल, नुकीले पत्ते टेढ़ी-मेढ़ी टहनी पर लगते हैं। आयुर्वेद में इसके पत्ते और छाल त्वचा रोग और पेशाब की जलन में उपयोगी बताए गए हैं।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
पत्ते, छाल, लकड़ी (सारकाष्ठ), बीज का तेल
आयुर्वेदिक गुण
रस: कटु, तिक्त, कषाय · गुण: गुरु · तासीर: गर्म
दोषों पर असर
कफ और वात को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • पत्तों का शरबत या काढ़ा लोक-परंपरा में पेशाब की जलन और गर्मी में दिया जाता है।
  • छाल और पत्तों का काढ़ा आयुर्वेद में त्वचा रोग, कोढ़ और फोड़ों में प्रयोग होता है।
  • पत्तों का लेप आँखों की जलन और सूजन पर लोक-परंपरा में।
  • खेत की मेड़ और सड़क किनारे लकड़ी और छाया के लिए सबसे लोकप्रिय पेड़; मिट्टी में नाइट्रोजन भी बढ़ाता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, नदी किनारे की रेतीली-दोमट मिट्टी सबसे अच्छी; सूखा और पाला सह लेता है। बरसात में लगाएँ; तेज़ी से बढ़ता है। 15–20 साल में अच्छी लकड़ी।

सदाबहार

सदाबहार Sadabahar (Periwinkle)

Catharanthus roseus · Apocynaceae

संस्कृत: सदापुष्पी, नित्यकल्याणी

फूल⚠ ज़हरीला / सावधानीNursery में उपलब्ध

सदाबहार साल के बारहों महीने गुलाबी, सफ़ेद या बैंगनी फूल देने वाला छोटा, बहुत कम देखभाल वाला पौधा है। मेडागास्कर से आए इस पौधे से दो महत्वपूर्ण कैंसर-रोधी दवाएँ (विन्क्रिस्टिन और विनब्लास्टिन) बनाई जाती हैं, जो इसके अंदर बहुत कम मात्रा में होती हैं। लोक-चिकित्सा में इसके पत्ते शुगर के लिए प्रसिद्ध हैं।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
पत्ते, फूल, जड़ (केवल दवा उद्योग के लिए)

पारंपरिक उपयोग

  • लोक-परंपरा में इसके पत्ते शुगर संतुलन के लिए चबाए जाते हैं — पर यह ज़हरीले असर वाला पौधा है, इसलिए डॉक्टर की सलाह के बिना ऐसा न करें।
  • इसी पौधे से कैंसर की दवाएँ फैक्ट्री में शुद्ध करके बनती हैं; घर पर पत्ते खाने से यह असर नहीं मिलता।
  • पत्तों का लेप लोक-परंपरा में ततैया के डंक और घाव पर लगाया जाता है।
  • बगीचे की क्यारी, गमले और कठिन सूखी जगहों में सालभर फूलों के लिए सबसे आसान पौधा।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, अच्छी निकासी वाली मिट्टी, कम पानी। किसी भी मौसम में लगा सकते हैं; बीज से अपने आप उग आता है।

सावधानी: पूरा पौधा ज़हरीला है — पत्ते या फूल खाने से बचें, विशेषकर बच्चे और पालतू जानवर। शुगर की दवा के साथ इसके पत्ते न लें।

सर्पगंधा

सर्पगंधा Sarpagandha

Rauvolfia serpentina · Apocynaceae

संस्कृत: सर्पगन्धा, चन्द्रिका, नाकुली

जड़ी-बूटी⚠ ज़हरीला / सावधानीNursery में उपलब्ध

सर्पगंधा 30–60 सेमी की छोटी झाड़ी है, जिस पर लाल डंठल वाले सफ़ेद-गुलाबी फूलों के गुच्छे और फिर चमकीले लाल-काले फल लगते हैं। पुराने समय में इसकी जड़ साँप के काटने और पागलपन में दी जाती थी। इसी की जड़ से निकले 'रेसरपीन' से 1950 के दशक में दुनिया की पहली BP की दवाओं में से एक बनी थी।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
जड़ (मुख्य)
आयुर्वेदिक गुण
रस: तिक्त · गुण: रूक्ष · तासीर: गर्म
दोषों पर असर
कफ और वात को शांत करती है।

पारंपरिक उपयोग

  • आयुर्वेद में जड़ का प्रयोग ऊँचे BP, अनिद्रा और मानसिक बेचैनी के योगों में, केवल वैद्य की देखरेख में होता है।
  • लोक-परंपरा में जड़ का लेप साँप-बिच्छू के काटने पर लगाया जाता था (आज साँप काटने पर तुरंत अस्पताल जाएँ)।
  • औषधीय खेती में किसानों के लिए अच्छी आमदनी वाली फसल।
  • औषधीय बगीचे में पहचान और जानकारी के लिए महत्वपूर्ण पौधा।

कैसे लगाएँ और देखभाल

हल्की छाँव, नम, उपजाऊ, अच्छी निकासी वाली मिट्टी। बरसात में बीज या कलम लगाएँ। जड़ 18 महीने में तैयार होती है।

सावधानी: यह बहुत तेज़ असर वाली दवा है — ख़ुद से कभी न लें। उदासी (डिप्रेशन), पेट के अल्सर और गर्भावस्था में बिल्कुल नहीं। BP की दवा डॉक्टर की सलाह से ही।

सागवान

सागवान Teak (Sagwan)

Tectona grandis · Lamiaceae

संस्कृत: शाक, खरच्छद, द्वारदारु

वृक्षNursery में उपलब्ध

सागवान (सागौन) दुनिया की सबसे क़ीमती इमारती लकड़ियों में से एक है — दीमक, पानी और मौसम से न ख़राब होने वाली सुनहरी-भूरी लकड़ी। इसके बहुत बड़े, खुरदुरे पत्ते मसलने पर लाल रंग छोड़ते हैं। संस्कृत नाम 'द्वारदारु' बताता है कि पुराने समय से इससे दरवाज़े बनते आए हैं।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
लकड़ी, छाल, पत्ते, फूल, बीज का तेल
आयुर्वेदिक गुण
रस: कषाय, मधुर · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
कफ और पित्त को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • लकड़ी से दरवाज़े, खिड़की, फर्नीचर और नाव बनती हैं; खेत की मेड़ पर लगाना किसानों के लिए लंबी अवधि का निवेश है।
  • लोक-परंपरा में छाल का काढ़ा दस्त और लकड़ी का लेप सिरदर्द-सूजन में लगाया जाता है।
  • कोमल पत्तों से प्राकृतिक लाल-भूरा रंग बनता है।
  • फूलों और बीजों का प्रयोग आयुर्वेद में पेशाब की तकलीफ़ में बताया गया है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, गहरी, अच्छी निकासी वाली मिट्टी; जलभराव से बचाएँ। बरसात में लगाएँ। 15–20 साल में अच्छी लकड़ी; सर्दी में पत्ते झड़ते हैं।

साल (सखुआ) Sal (Sakhua)

Shorea robusta · Dipterocarpaceae

संस्कृत: शाल, सर्ज, अश्वकर्ण

वृक्षNursery में उपलब्ध

साल (सखुआ) झारखंड का राज्य वृक्ष और पूर्वी भारत के जंगलों का राजा है। इसकी लकड़ी बहुत मज़बूत होती है और रेल की पटरियों के स्लीपर, खंभे और दरवाज़े बनाने में काम आती है। सरहुल पर्व में साल के फूलों की पूजा होती है और भगवान बुद्ध का जन्म साल वृक्ष के नीचे माना जाता है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
राल (धूना), छाल, बीज का तेल, पत्ते
आयुर्वेदिक गुण
रस: कषाय, मधुर · गुण: रूक्ष · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
कफ और पित्त को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • साल की राल (धूना) पूजा में धूप के रूप में जलाई जाती है।
  • आयुर्वेद में राल को मरहम में मिलाकर घाव, जलन और फटी त्वचा पर लगाया जाता है।
  • कसैली छाल का काढ़ा दस्त और खूनी पेचिश में लोक-परंपरा में दिया जाता है।
  • पत्तों से पत्तल-दोना बनते हैं और बीज का तेल खाने व चॉकलेट उद्योग में उपयोग होता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, गहरी, अच्छी निकासी वाली मिट्टी; छोटे पौधे को गर्मी में नियमित पानी दें। बरसात में लगाएँ। बहुत धीरे बढ़ता है और बड़ा जंगली पेड़ बनता है — खेत की मेड़ या बड़े परिसर के लिए।

सुपारी

सुपारी Supari (Areca Nut)

Areca catechu · Arecaceae (ताल कुल)

संस्कृत: पूग, गुवाक, क्रमुक

वृक्ष⚠ ज़हरीला / सावधानीNursery में उपलब्ध

सुपारी का पेड़ पतले, सीधे तने वाला सुंदर ताड़ (पाम) है, जिस पर नारंगी-लाल फलों के गुच्छे लगते हैं। पूजा में सुपारी को गणेश जी का प्रतीक मानकर रखा जाता है। पान के साथ थोड़ी सुपारी खाने की परंपरा है, पर इसकी लत सेहत के लिए बहुत हानिकारक है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
बीज (सुपारी), कोमल पत्ते, जड़
आयुर्वेदिक गुण
रस: कषाय, मधुर · गुण: गुरु, रूक्ष · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
कफ और पित्त को शांत करती है।

पारंपरिक उपयोग

  • पूजा, विवाह और शुभ कार्यों में 'पूगीफल' के रूप में सुपारी अनिवार्य है।
  • आयुर्वेद में बहुत थोड़ी मात्रा में पेट के कीड़ों और पाचन के योगों में इसका प्रयोग बताया गया है।
  • पौधा घर के अंदर-बाहर सुंदर सजावटी पाम के रूप में लगाया जाता है।
  • सूखे पत्तों के आवरण (खोल) से इको-फ्रेंडली प्लेट और दोने बनते हैं।

कैसे लगाएँ और देखभाल

गर्म, नम जलवायु, धूप या हल्की छाँव, नियमित पानी; पाले से बचाएँ। बरसात में लगाएँ। गमले में सजावटी पाम के रूप में अच्छा; फल के लिए कई साल लगते हैं।

सावधानी: रोज़ सुपारी चबाने की आदत मुँह के कैंसर और 'ओरल सबम्यूकस फाइब्रोसिस' (मुँह न खुलना) का बड़ा कारण है — सुपारी और गुटखे की लत से बचें।

सूरजमुखी

सूरजमुखी Sunflower

Helianthus annuus · Asteraceae (भृंगराज कुल)

संस्कृत: सूर्यमुखी, आदित्यभक्ता

फूलNursery में उपलब्ध

सूरजमुखी का बड़ा पीला फूल कलियों के समय सूरज की दिशा में घूमता है, इसीलिए इसका यह नाम है। यह उत्तरी अमेरिका का पौधा है, जिसके बीजों से खाने का तेल बनता है। बच्चों को बीज से पौधा उगाना सिखाने के लिए यह सबसे अच्छा फूल है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
बीज, बीज का तेल, फूल

पारंपरिक उपयोग

  • भुने बीज प्रोटीन, अच्छे वसा और विटामिन E से भरपूर नाश्ता हैं।
  • सूरजमुखी तेल खाना पकाने और त्वचा पर मालिश में उपयोग होता है।
  • फूल मधुमक्खियों को आकर्षित करते हैं, जिससे आस-पास की सब्ज़ियों में परागण बढ़ता है।
  • बीज पक्षियों के दाने के रूप में।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप (कम से कम 6–8 घंटे) और अच्छी निकासी वाली मिट्टी। फरवरी–मार्च या अक्टूबर–नवंबर में सीधे बीज बोएँ; 60–80 दिन में फूल। ऊँची किस्मों को डंडे का सहारा दें।

सेब

सेब Apple

Malus domestica · Rosaceae (गुलाब कुल)

संस्कृत: सेव, सिञ्चितिका (आधुनिक नाम)

फलदारNursery में उपलब्ध

सेब ठंडे पहाड़ों का फल है, पर अब HRMN-99 जैसी कम ठंड चाहने वाली किस्में बिहार के मैदान में भी फल दे रही हैं (जून में पकती हैं)। कहावत है 'रोज़ एक सेब, डॉक्टर को दूर रखे'। सेब रेशे (पेक्टिन), पानी और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
फल

पारंपरिक उपयोग

  • छिलके सहित सेब खाने से रेशे के कारण पाचन और कब्ज़ में मदद मिलती है।
  • उबला या कद्दूकस किया सेब बच्चों और बुज़ुर्गों के दस्त में पारंपरिक आहार है।
  • बीमारी के बाद कमज़ोरी और भूख न लगने में हल्का, पौष्टिक फल।
  • सेब का सिरका रसोई और घरेलू नुस्खों में उपयोग होता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, अच्छी निकासी वाली दोमट मिट्टी। दिसंबर–फरवरी में लगाएँ। HRMN-99 बिहार में 2–3 साल में फल देता है; अच्छे फल के लिए दो पौधे पास-पास लगाएँ और सर्दी में छँटाई करें।

सावधानी: सेब के बीज चबाकर न खाएँ — इनमें थोड़ी मात्रा में ज़हरीला तत्व होता है।

सेमल Semal (Silk Cotton)

Bombax ceiba · Malvaceae

संस्कृत: शाल्मली, मोचा, पिच्छिला

वृक्षNursery में उपलब्ध

सेमल बहुत ऊँचा, सीधा पेड़ है, जिसके तने पर मोटे काँटे होते हैं और फरवरी–मार्च में पत्ते झड़ने के बाद यह बड़े, लाल, कप जैसे फूलों से भर जाता है। गर्मी में फलियाँ फटकर रेशमी सफ़ेद रुई उड़ाती हैं, जिससे तकिए-गद्दे भरे जाते हैं। इसका गोंद 'मोचरस' आयुर्वेद में दस्त और खून रोकने की प्रसिद्ध दवा है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
गोंद (मोचरस), छाल, फूल, कोमल जड़ (सेमल मूसली), काँटे, रुई
आयुर्वेदिक गुण
रस: मधुर, कषाय · गुण: लघु, स्निग्ध, पिच्छिल · तासीर: ठंडी
दोषों पर असर
वात और पित्त को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • मोचरस (गोंद) का चूर्ण दस्त, पेचिश और खूनी बवासीर में पारंपरिक रूप से दिया जाता है।
  • कोमल पौधे की जड़ (सेमल मूसली) बल और ताक़त बढ़ाने वाली मानी गई है।
  • काँटों को पीसकर दूध में लेप चेहरे के मुहाँसों पर लगाने की लोक-परंपरा है।
  • फूलों की सब्ज़ी देहात में बनती है; रुई तकिए-रज़ाई में भरी जाती है।
  • फूल पक्षियों और मधुमक्खियों के लिए बसंत का भोजन हैं।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, किसी भी मिट्टी में; बहुत तेज़ बढ़ता है। बरसात में लगाएँ। बहुत ऊँचा पेड़ बनता है, इसलिए खुली जगह, खेत या सड़क किनारे लगाएँ।

हड़जोड़

हड़जोड़ Hadjod

Cissus quadrangularis · Vitaceae (द्राक्षा कुल)

संस्कृत: अस्थिसंहार, वज्रवल्ली, चतुष्प्रहार

लता / बेलNursery में उपलब्ध

हड़जोड़ एक अनोखी बेल है, जिसका तना चार कोनों वाला, गूदेदार और गाँठ-गाँठ में बँटा होता है — जैसे हड्डियाँ जुड़ी हों। संस्कृत नाम 'अस्थि-संहार' (हड्डी जोड़ने वाला) और हिंदी नाम 'हड़जोड़' इसी गुण से आए हैं। आयुर्वेद में टूटी हड्डी जल्दी जोड़ने के लिए यह सबसे प्रसिद्ध औषधि है।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
तना (मुख्य), पत्ते
आयुर्वेदिक गुण
रस: मधुर · गुण: लघु, रूक्ष · तासीर: गर्म
दोषों पर असर
कफ और वात को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • टूटी हड्डी, मोच और चोट में तने का रस या लेप पारंपरिक रूप से प्रयोग होता है (प्लास्टर और डॉक्टर के इलाज के साथ)।
  • हड्डियों की कमज़ोरी और जोड़ों के दर्द में आयुर्वेद में इसका प्रयोग होता है।
  • तने की चटनी और पापड़ दक्षिण भारत में पाचन के लिए खाए जाते हैं।
  • पेट दर्द और भूख बढ़ाने के लिए लोक-परंपरा में।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, रेतीली मिट्टी, बहुत कम पानी। तने का 2–3 गाँठ वाला टुकड़ा किसी भी मौसम में लगा दें, आसानी से उग जाता है। जाली या दीवार पर चढ़ाएँ।

सावधानी: ताज़ा तना छूने से कुछ लोगों को खुजली होती है — पकाकर या घी में भूनकर ही खाएँ।

हरसिंगार (पारिजात)

हरसिंगार (पारिजात) Harsingar (Parijat)

Nyctanthes arbor-tristis · Oleaceae (पारिजात कुल)

संस्कृत: पारिजात, शेफालिका, प्राजक्ता

फूलNursery में उपलब्ध

हरसिंगार (पारिजात) — हमारी नर्सरी का नाम इसी पवित्र पौधे पर है। इसके सफ़ेद, नारंगी डंडी वाले, बेहद खुशबूदार फूल रात में खिलते हैं और सुबह ज़मीन पर बिछ जाते हैं। मान्यता है कि श्रीकृष्ण इसे स्वर्ग से लाए थे; यह एकमात्र फूल है जिसे ज़मीन से उठाकर भगवान को चढ़ाया जाता है। आयुर्वेद में इसके पत्ते जोड़ों के दर्द और बुखार की प्रसिद्ध दवा हैं।

पूरी जानकारी: उपयोग, गुण, लगाने का तरीका
उपयोगी भाग
पत्ते (मुख्य), फूल, बीज, छाल
आयुर्वेदिक गुण
रस: तिक्त · गुण: लघु, रूक्ष · तासीर: गर्म
दोषों पर असर
कफ और वात को शांत करता है।

पारंपरिक उपयोग

  • पत्तों का काढ़ा जोड़ों के दर्द और साइटिका (गृध्रसी) में आयुर्वेद में प्रयोग होता है।
  • पुराने बुखार और बार-बार आने वाले बुखार में पत्तों का रस परंपरा से दिया जाता है।
  • पत्तों का रस बच्चों के पेट के कीड़ों में लोक-परंपरा में दिया जाता है।
  • नारंगी डंडियों से पहले कपड़े और मिठाई रँगने का प्राकृतिक रंग बनता था।
  • फूल पूजा, माला और खुशबू के लिए; बंगाल में शरद ऋतु और दुर्गा पूजा का प्रतीक।

कैसे लगाएँ और देखभाल

धूप या हल्की छाँव, अच्छी निकासी वाली मिट्टी; जलभराव से बचाएँ। बरसात में लगाएँ। अगस्त से दिसंबर तक फूल। फूल के बाद (फरवरी) हल्की छँटाई करें।

सावधानी: पत्ते बहुत कड़वे हैं; ज़्यादा मात्रा से पेट में जलन या उल्टी हो सकती है। गर्भावस्था में अंदरूनी सेवन न करें।