
कचनार
Kachnar
Bauhinia variegata · Fabaceae (शिम्बी कुल)
संस्कृत नाम: काञ्चनार, कोविदार
संक्षेप में: स्वाद में कसैला, तासीर ठंडी। जलन, एसिडिटी और गर्मी; बलगम, सर्दी-खाँसी और भारीपन जैसी तकलीफ़ों में सहायक मानी जाती है।
किस्में: कचनार ₹110 · कचनार (सफ़ेद) ₹110
डिलीवरी ₹100 से (200 कि.मी. तक) · नर्सरी से लेने पर निःशुल्क
परिचय
कचनार के पत्ते ऊँट के खुर या तितली के पंख जैसे दो भागों में बँटे होते हैं और बसंत में इस पर गुलाबी-बैंगनी या सफ़ेद, ऑर्किड जैसे सुंदर फूल आते हैं। इसकी कलियों की सब्ज़ी और रायता उत्तर भारत में बहुत पसंद है। आयुर्वेद का प्रसिद्ध 'काञ्चनार गुग्गुलु' इसी की छाल से बनता है।
पारंपरिक उपयोग
- आयुर्वेद में छाल का प्रयोग गाँठ, गिल्टी और गले की सूजन (गण्डमाला) में किया जाता है।
- कसैली छाल का काढ़ा दस्त, खूनी बवासीर और मुँह के छालों में कुल्ले के रूप में।
- कलियों की सब्ज़ी और अचार स्वादिष्ट और रेशेदार भोजन है।
- सड़क किनारे और बगीचे में बसंत के फूलों के लिए सुंदर पेड़।
आयुर्वेदिक गुण
- रस (स्वाद)
- कषाय (कसैला)
- गुण (प्रकृति)
- लघु (हल्का, जल्दी पचने वाला), रूक्ष (रूखा, नमी सुखाने वाला)
- तासीर
- ठंडी
- दोषों पर असर
- कफ और पित्त को शांत करता है।
कैसे लगाएँ और देखभाल
पूरी धूप, सामान्य मिट्टी; सूखा सह लेता है। बरसात में लगाएँ; 3–4 साल में फूल देने लगता है।
शब्दावली
- गुग्गुलु
- गुग्गुल (एक पेड़ का गोंद) से बनी गोली
- गण्डमाला
- गले की गाँठें या गिल्टियाँ
- कफ
- शरीर की नमी और बलगम वाली शक्ति; बिगड़ने पर सर्दी-खाँसी, बलगम, भारीपन और सुस्ती
- पित्त
- शरीर की गर्मी और पाचन वाली शक्ति; बिगड़ने पर जलन, एसिडिटी, ज़्यादा गर्मी और फोड़े-फुंसी
यह जानकारी पारंपरिक आयुर्वेद और लोक-ज्ञान पर आधारित है और केवल जानकारी के लिए है, इलाज के लिए नहीं। किसी भी बीमारी में डॉक्टर या पंजीकृत आयुर्वेदिक वैद्य की सलाह से ही दवा लें, और चल रही दवा अपने आप बंद न करें। गर्भावस्था, छोटे बच्चों और पहले से दवा ले रहे लोगों को विशेष सावधानी रखनी चाहिए।





