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गम्हार – Gamhar

गम्हार

Gamhar

Gmelina arborea · Lamiaceae

संस्कृत नाम: गम्भारी, काश्मरी, श्रीपर्णी

वृक्षनर्सरी में उपलब्ध
उपयोगी भागजड़ (दशमूल में), फल, छाल, पत्ते
तासीरगर्म
धूपपूरी धूप
पानीमध्यम — ऊपर की मिट्टी सूखने पर
लगाने का समयजुलाई, अगस्त

संक्षेप में: स्वाद में कड़वा, कसैला, मीठा, तासीर गर्म। वात, पित्त और कफ — तीनों को संतुलित रखने वाली।

₹50छोटे पौधे का मूल्य · बड़े आकार का मूल्य अलग

डिलीवरी ₹100 से (200 कि.मी. तक) · नर्सरी से लेने पर निःशुल्क

परिचय

गम्हार (गम्भारी) तेज़ी से बढ़ने वाला, चौड़े दिल के आकार के पत्तों वाला पेड़ है, जिस पर बसंत में पीले-भूरे फूल और फिर पीले फल लगते हैं। इसकी जड़ आयुर्वेद के प्रसिद्ध 'दशमूल' (दस जड़ों का योग) में शामिल है। बिहार-झारखंड में इसकी हल्की, मज़बूत लकड़ी फर्नीचर के लिए बहुत लोकप्रिय है।

पारंपरिक उपयोग

  1. दशमूल (जिसमें गम्भारी की जड़ है) का काढ़ा बुखार, सूजन, जोड़ों के दर्द और प्रसव के बाद की कमज़ोरी में दिया जाता है।
  2. पके फल ठंडक देने वाले और पौष्टिक माने गए हैं; पेशाब की जलन में उपयोग।
  3. पत्तों का लेप सिरदर्द और घाव पर लोक-परंपरा में लगाया जाता है।
  4. खेतों की मेड़ और बागान में लकड़ी के लिए उगाया जाता है; 8–10 साल में तैयार।

आयुर्वेदिक गुण

रस (स्वाद)
तिक्त (कड़वा), कषाय (कसैला), मधुर (मीठा)
गुण (प्रकृति)
गुरु (भारी, देर से पचने वाला)
तासीर
गर्म
दोषों पर असर
तीनों दोषों को शांत करता है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, गहरी, अच्छी निकासी वाली मिट्टी। बरसात में लगाएँ; बहुत तेज़ बढ़ता है।

शब्दावली

दशमूल
दस पेड़-पौधों की जड़ों का मशहूर आयुर्वेदिक मिश्रण — सूजन, दर्द और बुखार में
वात · पित्त · कफ
शरीर की तीन मूल शक्तियाँ — वात, पित्त और कफ; इनका संतुलन बिगड़ने पर रोग होते हैं। वात = गैस, दर्द, रूखापन; पित्त = जलन, एसिडिटी, गर्मी; कफ = बलगम, सर्दी-खाँसी, भारीपन।

यह जानकारी पारंपरिक आयुर्वेद और लोक-ज्ञान पर आधारित है और केवल जानकारी के लिए है, इलाज के लिए नहीं। किसी भी बीमारी में डॉक्टर या पंजीकृत आयुर्वेदिक वैद्य की सलाह से ही दवा लें, और चल रही दवा अपने आप बंद न करें। गर्भावस्था, छोटे बच्चों और पहले से दवा ले रहे लोगों को विशेष सावधानी रखनी चाहिए।

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