
कपूर
Camphor Tree
Cinnamomum camphora · Lauraceae (कर्पूर कुल)
संस्कृत नाम: कर्पूर, घनसार, हिमवालुका
संक्षेप में: स्वाद में कड़वा, तीखा-चरपरा, मीठा, तासीर ठंडी। जलन, एसिडिटी और गर्मी; बलगम, सर्दी-खाँसी और भारीपन जैसी तकलीफ़ों में सहायक मानी जाती है — यह विशेष सावधानी वाला पौधा है; इसका सेवन केवल वैद्य की देखरेख में करें।
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परिचय
कपूर का पेड़ चमकीले पत्तों वाला सदाबहार पेड़ है, जिसके पत्ते मसलने पर कपूर की तेज़ खुशबू आती है। पारंपरिक 'भीमसेनी' कपूर इसी परिवार के पेड़ों से बनता है; बाज़ार की कपूर की टिकिया ज़्यादातर रसायन से बनती है। पूजा-आरती में कपूर का बहुत महत्व है।
पारंपरिक उपयोग
- कपूर को नारियल तेल में मिलाकर छाती पर मलने से बंद नाक और जकड़न में आराम मिलता है।
- जोड़ों और मांसपेशियों के दर्द के तेलों और बाम में कपूर डाला जाता है।
- खुजली और त्वचा की जलन पर कपूर मिला तेल ठंडक देता है।
- कपड़ों और अनाज में कीड़े भगाने और आरती में जलाने के काम आता है।
आयुर्वेदिक गुण
- रस (स्वाद)
- तिक्त (कड़वा), कटु (तीखा-चरपरा), मधुर (मीठा)
- गुण (प्रकृति)
- लघु (हल्का, जल्दी पचने वाला), तीक्ष्ण (तेज़ असर वाला)
- तासीर
- ठंडी
- दोषों पर असर
- कफ और पित्त को शांत करता है।
कैसे लगाएँ और देखभाल
धूप या हल्की छाँव, अच्छी निकासी वाली मिट्टी। बरसात में लगाएँ। धीरे बढ़ता है; पत्ते तोड़कर खुशबू के लिए आँगन में लगा सकते हैं।
ध्यान दें
कपूर खाने की चीज़ नहीं है — थोड़ी मात्रा भी बच्चों में दौरे (मिर्गी जैसे झटके) ला सकती है। छोटे बच्चों की नाक के पास कपूर न लगाएँ।
शब्दावली
- रसायन
- शरीर को ताक़त देने, रोगों से बचाने और बुढ़ापा धीमा करने वाली औषधि
- कफ
- शरीर की नमी और बलगम वाली शक्ति; बिगड़ने पर सर्दी-खाँसी, बलगम, भारीपन और सुस्ती
- पित्त
- शरीर की गर्मी और पाचन वाली शक्ति; बिगड़ने पर जलन, एसिडिटी, ज़्यादा गर्मी और फोड़े-फुंसी
यह जानकारी पारंपरिक आयुर्वेद और लोक-ज्ञान पर आधारित है और केवल जानकारी के लिए है, इलाज के लिए नहीं। किसी भी बीमारी में डॉक्टर या पंजीकृत आयुर्वेदिक वैद्य की सलाह से ही दवा लें, और चल रही दवा अपने आप बंद न करें। गर्भावस्था, छोटे बच्चों और पहले से दवा ले रहे लोगों को विशेष सावधानी रखनी चाहिए।





