
मूली
Mooli (Radish)
Raphanus sativus · Brassicaceae (सर्षप कुल)
संस्कृत नाम: मूलक, हस्तिदन्त
संक्षेप में: स्वाद में तीखा-चरपरा, तासीर गर्म। गैस, जोड़ों का दर्द और रूखापन; बलगम, सर्दी-खाँसी और भारीपन जैसी तकलीफ़ों में सहायक मानी जाती है।
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परिचय
मूली सर्दियों की आम सब्ज़ी है, जिसकी सफ़ेद, लंबी जड़ सलाद, पराठे और अचार में खाई जाती है। इसके पत्ते (मूली का साग) भी पौष्टिक हैं। आयुर्वेद में छोटी, कोमल मूली को पाचक और बड़ी पकी मूली को भारी बताया गया है।
पारंपरिक उपयोग
- कच्ची मूली भोजन के साथ भूख और पाचन बढ़ाने के लिए खाई जाती है।
- मूली का रस लोक-परंपरा में पीलिया और पेशाब की तकलीफ़ में दिया जाता है।
- मूली के पत्तों का साग आयरन और रेशे से भरपूर।
- बवासीर में मूली खाने की लोक-परंपरा।
आयुर्वेदिक गुण
- रस (स्वाद)
- कटु (तीखा-चरपरा)
- गुण (प्रकृति)
- लघु (हल्का, जल्दी पचने वाला), तीक्ष्ण (तेज़ असर वाला)
- तासीर
- गर्म (कच्ची, छोटी मूली)
- दोषों पर असर
- कफ और वात को शांत करती है।
कैसे लगाएँ और देखभाल
सितंबर–जनवरी में बीज सीधे बोएँ; धूप, भुरभुरी मिट्टी। 40–50 दिन में तैयार। गहरे गमले में भी उगती है।
ध्यान दें
रात को और दूध के साथ मूली खाने से कुछ लोगों को गैस होती है।
शब्दावली
- कफ
- शरीर की नमी और बलगम वाली शक्ति; बिगड़ने पर सर्दी-खाँसी, बलगम, भारीपन और सुस्ती
- वात
- शरीर की हवा/गति वाली शक्ति; बिगड़ने पर गैस, जोड़ों का दर्द, रूखापन, कब्ज़ और बेचैनी
यह जानकारी पारंपरिक आयुर्वेद और लोक-ज्ञान पर आधारित है और केवल जानकारी के लिए है, इलाज के लिए नहीं। किसी भी बीमारी में डॉक्टर या पंजीकृत आयुर्वेदिक वैद्य की सलाह से ही दवा लें, और चल रही दवा अपने आप बंद न करें। गर्भावस्था, छोटे बच्चों और पहले से दवा ले रहे लोगों को विशेष सावधानी रखनी चाहिए।


