
फालसा
Falsa
Grewia asiatica · Malvaceae
संस्कृत नाम: परूषक
संक्षेप में: स्वाद में मीठा, खट्टा, तासीर ठंडी। गैस, जोड़ों का दर्द और रूखापन; जलन, एसिडिटी और गर्मी जैसी तकलीफ़ों में सहायक मानी जाती है।
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परिचय
फालसा एक झाड़ीनुमा छोटा पेड़ है, जिस पर मई–जून में मटर जितने छोटे, बैंगनी-काले, खट्टे-मीठे फल गुच्छों में लगते हैं। इसका शरबत उत्तर भारत में गर्मी का सबसे लोकप्रिय ठंडा पेय है। आयुर्वेद में पका फालसा ठंडक देने वाला, प्यास और जलन मिटाने वाला बताया गया है।
पारंपरिक उपयोग
- फालसे का शरबत लू, ज़्यादा प्यास और पेट की जलन में ठंडक देता है।
- पका फल हृदय के लिए हितकारी और कमज़ोरी में पौष्टिक माना गया है।
- छाल का काढ़ा लोक-परंपरा में पेशाब की जलन में दिया जाता है।
- पत्तों का लेप फोड़े-फुंसी पर लगाया जाता है।
आयुर्वेदिक गुण
- गुण
- पका फल — रस: मधुर (मीठा), अम्ल (खट्टा) · तासीर: ठंडी
- दोषों पर असर
- वात और पित्त को शांत करता है।
कैसे लगाएँ और देखभाल
पूरी धूप, किसी भी मिट्टी में; सूखा सह लेता है। बरसात या फरवरी में लगाएँ। हर साल जनवरी में ज़मीन से 1 मीटर ऊपर छँटाई करें, तो नई टहनियों पर ज़्यादा फल आते हैं। 2 साल में फल।
शब्दावली
- वात
- शरीर की हवा/गति वाली शक्ति; बिगड़ने पर गैस, जोड़ों का दर्द, रूखापन, कब्ज़ और बेचैनी
- पित्त
- शरीर की गर्मी और पाचन वाली शक्ति; बिगड़ने पर जलन, एसिडिटी, ज़्यादा गर्मी और फोड़े-फुंसी
यह जानकारी पारंपरिक आयुर्वेद और लोक-ज्ञान पर आधारित है और केवल जानकारी के लिए है, इलाज के लिए नहीं। किसी भी बीमारी में डॉक्टर या पंजीकृत आयुर्वेदिक वैद्य की सलाह से ही दवा लें, और चल रही दवा अपने आप बंद न करें। गर्भावस्था, छोटे बच्चों और पहले से दवा ले रहे लोगों को विशेष सावधानी रखनी चाहिए।





