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लाल मिर्च (मिर्च) – Mirch (Chilli)

लाल मिर्च (मिर्च)

Mirch (Chilli)

Capsicum annuum · Solanaceae (कंटकारी कुल)

संस्कृत नाम: मरीचिका (आधुनिक), कटुवीरा

मसाले व बीजनर्सरी में उपलब्ध
उपयोगी भागफल (हरा व लाल)
तासीरगर्म
धूपपूरी धूप
पानीमध्यम — ऊपर की मिट्टी सूखने पर

संक्षेप में: स्वाद में तीखा-चरपरा, तासीर गर्म। गैस, जोड़ों का दर्द और रूखापन; बलगम, सर्दी-खाँसी और भारीपन जैसी तकलीफ़ों में सहायक मानी जाती है।

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डिलीवरी ₹100 से (200 कि.मी. तक) · नर्सरी से लेने पर निःशुल्क

परिचय

मिर्च दक्षिण अमेरिका से लगभग 500 साल पहले भारत आई और अब भारतीय खाने की पहचान है। हरी मिर्च पकने पर लाल हो जाती है। इसका तीखा तत्व 'कैप्साइसिन' दर्द-निवारक मरहमों में भी इस्तेमाल होता है।

पारंपरिक उपयोग

  1. थोड़ी मिर्च भूख बढ़ाती है और पाचक रसों को सक्रिय करती है।
  2. हरी मिर्च विटामिन C से भरपूर होती है।
  3. कैप्साइसिन वाले मरहम जोड़ों और नसों के दर्द में लगाए जाते हैं।
  4. नज़र उतारने की लोक-परंपरा में नींबू-मिर्च टाँगे जाते हैं।

आयुर्वेदिक गुण

रस (स्वाद)
कटु (तीखा-चरपरा)
गुण (प्रकृति)
तीक्ष्ण (तेज़ असर वाला)
तासीर
गर्म
दोषों पर असर
कफ और वात को शांत करती है, पित्त बहुत बढ़ाती है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

पूरी धूप, उपजाऊ मिट्टी। फरवरी–मार्च या जून–जुलाई में पौध लगाएँ; 60–70 दिन में फल। गमले में भी खूब फलती है।

ध्यान दें

एसिडिटी, अल्सर, बवासीर और पेट की जलन में मिर्च कम खाएँ। मिर्च छूकर आँख न मलें।

शब्दावली

कफ
शरीर की नमी और बलगम वाली शक्ति; बिगड़ने पर सर्दी-खाँसी, बलगम, भारीपन और सुस्ती
वात
शरीर की हवा/गति वाली शक्ति; बिगड़ने पर गैस, जोड़ों का दर्द, रूखापन, कब्ज़ और बेचैनी
पित्त
शरीर की गर्मी और पाचन वाली शक्ति; बिगड़ने पर जलन, एसिडिटी, ज़्यादा गर्मी और फोड़े-फुंसी

यह जानकारी पारंपरिक आयुर्वेद और लोक-ज्ञान पर आधारित है और केवल जानकारी के लिए है, इलाज के लिए नहीं। किसी भी बीमारी में डॉक्टर या पंजीकृत आयुर्वेदिक वैद्य की सलाह से ही दवा लें, और चल रही दवा अपने आप बंद न करें। गर्भावस्था, छोटे बच्चों और पहले से दवा ले रहे लोगों को विशेष सावधानी रखनी चाहिए।

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