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अलसी (तीसी) – Alsi (Flaxseed)

अलसी (तीसी)

Alsi (Flaxseed)

Linum usitatissimum · Linaceae

संस्कृत नाम: अतसी, उमा, क्षुमा

मसाले व बीजनर्सरी में उपलब्ध
उपयोगी भागबीज (मुख्य), बीज का तेल, तना (रेशा)
तासीरगर्म
धूपपूरी धूप
पानीकम — मिट्टी सूखने पर
लगाने का समयअक्टूबर, नवंबर

संक्षेप में: स्वाद में मीठा, कड़वा, तासीर गर्म। गैस, जोड़ों का दर्द और रूखापन जैसी तकलीफ़ों में सहायक मानी जाती है।

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परिचय

अलसी (तीसी) पतले तने और आसमानी-नीले फूलों वाली रबी की फ़सल है, जिसके चमकीले भूरे बीज बिहार में चटनी और लड्डू में खाए जाते हैं। इसके बीज ओमेगा-3 वसा और रेशे के सबसे अच्छे शाकाहारी स्रोत हैं। तने के रेशे से लिनेन कपड़ा बनता है।

पारंपरिक उपयोग

  1. भुनी अलसी का चूर्ण कब्ज़ में रेशे के रूप में लिया जाता है।
  2. ओमेगा-3 के कारण दिल और जोड़ों के लिए फायदेमंद माना जाता है।
  3. अलसी की गरम पुल्टिस फोड़े पकाने और सूजन में बाँधी जाती है।
  4. बीज का तेल लकड़ी पर पॉलिश और रंग-रोगन में काम आता है।

आयुर्वेदिक गुण

रस (स्वाद)
मधुर (मीठा), तिक्त (कड़वा)
गुण (प्रकृति)
गुरु (भारी, देर से पचने वाला), स्निग्ध (चिकनाई वाला)
तासीर
गर्म
दोषों पर असर
वात को शांत करती है; पित्त-कफ बढ़ा सकती है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

अक्टूबर–नवंबर में बीज बोएँ; धूप और सामान्य मिट्टी, कम पानी। मार्च तक बीज पक जाते हैं। फूलों के लिए गमले में भी लगा सकते हैं।

ध्यान दें

पीसकर और पर्याप्त पानी के साथ ही लें। कच्चे बीज ज़्यादा न खाएँ।

शब्दावली

वात
शरीर की हवा/गति वाली शक्ति; बिगड़ने पर गैस, जोड़ों का दर्द, रूखापन, कब्ज़ और बेचैनी
पित्त
शरीर की गर्मी और पाचन वाली शक्ति; बिगड़ने पर जलन, एसिडिटी, ज़्यादा गर्मी और फोड़े-फुंसी
कफ
शरीर की नमी और बलगम वाली शक्ति; बिगड़ने पर सर्दी-खाँसी, बलगम, भारीपन और सुस्ती

यह जानकारी पारंपरिक आयुर्वेद और लोक-ज्ञान पर आधारित है और केवल जानकारी के लिए है, इलाज के लिए नहीं। किसी भी बीमारी में डॉक्टर या पंजीकृत आयुर्वेदिक वैद्य की सलाह से ही दवा लें, और चल रही दवा अपने आप बंद न करें। गर्भावस्था, छोटे बच्चों और पहले से दवा ले रहे लोगों को विशेष सावधानी रखनी चाहिए।

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