
अजवायन
Ajwain (Carom)
Trachyspermum ammi · Apiaceae (अजमोद कुल)
संस्कृत नाम: यवानी, दीप्यक
संक्षेप में: स्वाद में तीखा-चरपरा, कड़वा, तासीर गर्म। गैस, जोड़ों का दर्द और रूखापन; बलगम, सर्दी-खाँसी और भारीपन जैसी तकलीफ़ों में सहायक मानी जाती है।
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परिचय
अजवायन लगभग 60–90 सेंटीमीटर ऊँचा, सौंफ जैसा दिखने वाला सालाना पौधा है। इसकी सफ़ेद छतरीनुमा फूलों की गुच्छियों में छोटे, भूरे, तेज़ खुशबू वाले बीज बनते हैं, जिनमें थाइमॉल नाम का तेल होता है। रसोई और आयुर्वेद दोनों में यह पेट की सबसे भरोसेमंद औषधियों में गिनी जाती है।
पारंपरिक उपयोग
- भारी भोजन के बाद गैस, पेट फूलना और अपच में अजवायन को काले नमक के साथ लेने की घरेलू परंपरा है।
- सर्दी-ज़ुकाम और बंद नाक में अजवायन की पोटली गरम करके सूँघी या सेंकी जाती है।
- बच्चे के जन्म के बाद माँ को अजवायन का पानी और लड्डू देने का रिवाज़ बिहार-यूपी में आम है।
- पूड़ी, पराठा, पकौड़ी और अचार में डालने से खाना सुपाच्य बनता है।
- आयुर्वेद में यह दीपन (भूख बढ़ाने वाली), पाचन और शूलहर (दर्द कम करने वाली) मानी गई है।
आयुर्वेदिक गुण
- रस (स्वाद)
- कटु (तीखा-चरपरा), तिक्त (कड़वा)
- गुण (प्रकृति)
- लघु (हल्का, जल्दी पचने वाला), रूक्ष (रूखा, नमी सुखाने वाला), तीक्ष्ण (तेज़ असर वाला)
- तासीर
- गर्म
- विपाक (पचने के बाद)
- कटु (तीखा-चरपरा)
- दोषों पर असर
- कफ और वात को शांत करती है, पित्त बढ़ा सकती है।
कैसे लगाएँ और देखभाल
अक्टूबर–नवंबर में बीज बोएँ; मार्च–अप्रैल तक बीज पक जाते हैं। धूप वाली जगह, हल्की भुरभुरी मिट्टी और कम पानी चाहिए। गमले में भी आसानी से उगती है। ध्यान दें: 'पत्ता अजवाइन' (मोटे पत्तों वाला पौधा) अलग पौधा है।
ध्यान दें
गर्म तासीर है, इसलिए गर्भावस्था, अल्सर या ज़्यादा पित्त (जलन, एसिडिटी) में अधिक मात्रा न लें।
शब्दावली
- दीपन
- भूख बढ़ाने वाली
- शूलहर
- दर्द कम करने वाली
- कफ
- शरीर की नमी और बलगम वाली शक्ति; बिगड़ने पर सर्दी-खाँसी, बलगम, भारीपन और सुस्ती
- वात
- शरीर की हवा/गति वाली शक्ति; बिगड़ने पर गैस, जोड़ों का दर्द, रूखापन, कब्ज़ और बेचैनी
- पित्त
- शरीर की गर्मी और पाचन वाली शक्ति; बिगड़ने पर जलन, एसिडिटी, ज़्यादा गर्मी और फोड़े-फुंसी
- तासीर
- शरीर पर गर्म या ठंडा असर
यह जानकारी पारंपरिक आयुर्वेद और लोक-ज्ञान पर आधारित है और केवल जानकारी के लिए है, इलाज के लिए नहीं। किसी भी बीमारी में डॉक्टर या पंजीकृत आयुर्वेदिक वैद्य की सलाह से ही दवा लें, और चल रही दवा अपने आप बंद न करें। गर्भावस्था, छोटे बच्चों और पहले से दवा ले रहे लोगों को विशेष सावधानी रखनी चाहिए।
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