
अशोक
Ashok (Sita Ashok)
Saraca asoca · Fabaceae (शिम्बी कुल)
संस्कृत नाम: अशोक, हेमपुष्प, वञ्जुल
संक्षेप में: स्वाद में कसैला, कड़वा, तासीर ठंडी। जलन, एसिडिटी और गर्मी; बलगम, सर्दी-खाँसी और भारीपन जैसी तकलीफ़ों में सहायक मानी जाती है।
डिलीवरी ₹100 से (200 कि.मी. तक) · नर्सरी से लेने पर निःशुल्क
परिचय
असली अशोक (सीता अशोक) एक मध्यम आकार का सदाबहार पेड़ है, जिस पर फरवरी–अप्रैल में नारंगी-लाल फूलों के घने गुच्छे लगते हैं। रामायण में सीता जी अशोक वाटिका में इसी पेड़ के नीचे रही थीं। आयुर्वेद में यह स्त्रियों के रोगों की प्रमुख औषधि है; अशोकारिष्ट इसी की छाल से बनता है।
पारंपरिक उपयोग
- छाल का प्रयोग आयुर्वेद में मासिक धर्म की अनियमितता, ज़्यादा रक्तस्राव और पेट दर्द में किया जाता है।
- कसैली छाल का काढ़ा खूनी बवासीर और दस्त में पारंपरिक रूप से दिया जाता है।
- फूल पूजा में चढ़ाए जाते हैं; चैत्र में 'अशोकाष्टमी' पर इसकी कलियाँ खाने की परंपरा है।
- घर-मंदिर के पास शुभ और छायादार पेड़ के रूप में लगाया जाता है।
आयुर्वेदिक गुण
- रस (स्वाद)
- कषाय (कसैला), तिक्त (कड़वा)
- गुण (प्रकृति)
- लघु (हल्का, जल्दी पचने वाला), रूक्ष (रूखा, नमी सुखाने वाला)
- तासीर
- ठंडी
- दोषों पर असर
- कफ और पित्त को शांत करता है।
कैसे लगाएँ और देखभाल
हल्की छाँव से धूप, नम उपजाऊ मिट्टी और नियमित पानी पसंद करता है। धीरे बढ़ता है। बरसात में लगाएँ। ध्यान दें: सड़क किनारे लगने वाला लंबा, पतला 'अशोक' (Polyalthia) दवा वाला अशोक नहीं है।
ध्यान दें
दवा के लिए केवल सीता अशोक की छाल ही लें; गर्भावस्था में वैद्य से पूछे बिना न लें।
शब्दावली
- कफ
- शरीर की नमी और बलगम वाली शक्ति; बिगड़ने पर सर्दी-खाँसी, बलगम, भारीपन और सुस्ती
- पित्त
- शरीर की गर्मी और पाचन वाली शक्ति; बिगड़ने पर जलन, एसिडिटी, ज़्यादा गर्मी और फोड़े-फुंसी
यह जानकारी पारंपरिक आयुर्वेद और लोक-ज्ञान पर आधारित है और केवल जानकारी के लिए है, इलाज के लिए नहीं। किसी भी बीमारी में डॉक्टर या पंजीकृत आयुर्वेदिक वैद्य की सलाह से ही दवा लें, और चल रही दवा अपने आप बंद न करें। गर्भावस्था, छोटे बच्चों और पहले से दवा ले रहे लोगों को विशेष सावधानी रखनी चाहिए।





