PARIJATNURSERY & GARDEN
Home › आयुर्वेदिक पौधे › काली राई
काली राई – Kali Rai (Black Mustard)

काली राई

Kali Rai (Black Mustard)

Brassica nigra · Brassicaceae (सर्षप कुल)

संस्कृत नाम: कृष्णसर्षप, राजिका (कुछ ग्रंथों में)

मसाले व बीज
उपयोगी भागबीज, बीज का तेल
तासीरगर्म

संक्षेप में: स्वाद में तीखा-चरपरा, कड़वा, तासीर गर्म। गैस, जोड़ों का दर्द और रूखापन; बलगम, सर्दी-खाँसी और भारीपन जैसी तकलीफ़ों में सहायक मानी जाती है।

यह पौधा अभी ऑनलाइन उपलब्ध नहीं है। उपलब्धता की जानकारी के लिए WhatsApp पर संपर्क करें।

परिचय

काली राई भूरी राई से ऊँचा पौधा है, जिसके छोटे काले बीज ज़्यादा तीखे होते हैं। दक्षिण भारत के तड़के और बंगाल की 'कासुंदी' (सरसों की चटनी) में इसका प्रयोग होता है। आयुर्वेद में सफ़ेद सरसों (सिद्धार्थक) और काली राई दोनों के अलग-अलग उपयोग बताए गए हैं।

पारंपरिक उपयोग

  1. पिसी काली राई का लेप (मस्टर्ड प्लास्टर) थोड़ी देर छाती पर लगाने की पुरानी परंपरा जकड़न और दर्द में।
  2. तड़के और अचार में भूख और पाचन के लिए।
  3. राई के तेल की मालिश जोड़ों के दर्द में।
  4. पूजा-पाठ और नज़र उतारने में राई का प्रयोग।

आयुर्वेदिक गुण

रस (स्वाद)
कटु (तीखा-चरपरा), तिक्त (कड़वा)
गुण (प्रकृति)
तीक्ष्ण (तेज़ असर वाला), स्निग्ध (चिकनाई वाला)
तासीर
गर्म
दोषों पर असर
कफ और वात को शांत करती है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

अक्टूबर–नवंबर में बीज छिड़कें; धूप, सामान्य मिट्टी, कम पानी। फरवरी–मार्च में बीज पकते हैं।

ध्यान दें

राई का लेप 10–15 मिनट से ज़्यादा न रखें, त्वचा जल सकती है।

शब्दावली

कफ
शरीर की नमी और बलगम वाली शक्ति; बिगड़ने पर सर्दी-खाँसी, बलगम, भारीपन और सुस्ती
वात
शरीर की हवा/गति वाली शक्ति; बिगड़ने पर गैस, जोड़ों का दर्द, रूखापन, कब्ज़ और बेचैनी

यह जानकारी पारंपरिक आयुर्वेद और लोक-ज्ञान पर आधारित है और केवल जानकारी के लिए है, इलाज के लिए नहीं। किसी भी बीमारी में डॉक्टर या पंजीकृत आयुर्वेदिक वैद्य की सलाह से ही दवा लें, और चल रही दवा अपने आप बंद न करें। गर्भावस्था, छोटे बच्चों और पहले से दवा ले रहे लोगों को विशेष सावधानी रखनी चाहिए।

इसी तरह के और पौधे