
अर्जुन
Arjun
Terminalia arjuna · Combretaceae (हरीतकी कुल)
संस्कृत नाम: अर्जुन, ककुभ, पार्थ
संक्षेप में: स्वाद में कसैला, तासीर ठंडी। जलन, एसिडिटी और गर्मी; बलगम, सर्दी-खाँसी और भारीपन जैसी तकलीफ़ों में सहायक मानी जाती है।
डिलीवरी ₹100 से (200 कि.मी. तक) · नर्सरी से लेने पर निःशुल्क
परिचय
अर्जुन नदियों-नालों के किनारे उगने वाला 20–25 मीटर ऊँचा सदाबहार जैसा पेड़ है, जिसकी छाल चिकनी, सफ़ेद-भूरी होती है और परतों में उतरती है। आयुर्वेद में इसकी छाल को हृदय के लिए सबसे प्रसिद्ध औषधि (हृद्य) माना गया है। अर्जुनारिष्ट और अर्जुन क्षीरपाक इसी से बनते हैं।
पारंपरिक उपयोग
- छाल को दूध में पकाकर (अर्जुन क्षीरपाक / अर्जुन की चाय) हृदय को बल देने के लिए परंपरा से लिया जाता है।
- आयुर्वेद में इसे 'संधानीय' कहा गया है, यानी टूटी हड्डी जोड़ने और चोट भरने में सहायक।
- कसैली छाल का काढ़ा दस्त, खून बहने और घाव धोने में प्रयोग होता है।
- पेड़ मिट्टी कटाव रोकने और नदी किनारे लगाने के लिए बहुत उपयोगी है।
आयुर्वेदिक गुण
- रस (स्वाद)
- कषाय (कसैला)
- गुण (प्रकृति)
- लघु (हल्का, जल्दी पचने वाला), रूक्ष (रूखा, नमी सुखाने वाला)
- तासीर
- ठंडी
- दोषों पर असर
- कफ और पित्त को शांत करता है।
कैसे लगाएँ और देखभाल
पूरी धूप, नम मिट्टी पसंद करता है, पर सामान्य ज़मीन पर भी उगता है। बरसात में लगाएँ। तेज़ी से बढ़ता है; छाल 8–10 साल के पेड़ से ही ली जाती है।
ध्यान दें
हृदय की बीमारी में अर्जुन लें तो भी डॉक्टर की दवा बंद न करें; पहले डॉक्टर से बात करें।
शब्दावली
- हृद्य
- दिल (हृदय) के लिए अच्छी
- क्षीरपाक
- दूध में पकाकर बनाई गई दवा
- संधानीय
- टूटी हड्डी और घाव जोड़ने वाली
- कफ
- शरीर की नमी और बलगम वाली शक्ति; बिगड़ने पर सर्दी-खाँसी, बलगम, भारीपन और सुस्ती
- पित्त
- शरीर की गर्मी और पाचन वाली शक्ति; बिगड़ने पर जलन, एसिडिटी, ज़्यादा गर्मी और फोड़े-फुंसी
यह जानकारी पारंपरिक आयुर्वेद और लोक-ज्ञान पर आधारित है और केवल जानकारी के लिए है, इलाज के लिए नहीं। किसी भी बीमारी में डॉक्टर या पंजीकृत आयुर्वेदिक वैद्य की सलाह से ही दवा लें, और चल रही दवा अपने आप बंद न करें। गर्भावस्था, छोटे बच्चों और पहले से दवा ले रहे लोगों को विशेष सावधानी रखनी चाहिए।





