PARIJATNURSERY & GARDEN
राई (सरसों) – Rai (Indian Mustard)

राई (सरसों)

Rai (Indian Mustard)

Brassica juncea · Brassicaceae (सर्षप कुल)

संस्कृत नाम: राजिका, क्षुताभिजनक, असुरी

मसाले व बीजनर्सरी में उपलब्ध
उपयोगी भागबीज, बीज का तेल, पत्ते (साग)
तासीरगर्म
धूपपूरी धूप
पानीकम — मिट्टी सूखने पर
लगाने का समयअक्टूबर, नवंबर

संक्षेप में: स्वाद में तीखा-चरपरा, कड़वा, तासीर गर्म। गैस, जोड़ों का दर्द और रूखापन; बलगम, सर्दी-खाँसी और भारीपन जैसी तकलीफ़ों में सहायक मानी जाती है।

₹50छोटे पौधे का मूल्य · बड़े आकार का मूल्य अलग

डिलीवरी ₹100 से (200 कि.मी. तक) · नर्सरी से लेने पर निःशुल्क

परिचय

राई (भूरी सरसों) सर्दियों में खेतों को पीले फूलों से भर देने वाली फ़सल है। इसके छोटे भूरे बीज तड़के और अचार में, तेल खाना पकाने और मालिश में, और पत्ते सरसों के साग में काम आते हैं। बिहार में सरसों तेल हर घर की ज़रूरत है।

पारंपरिक उपयोग

  1. सरसों तेल की मालिश सर्दियों में बच्चों, बुज़ुर्गों और जोड़ों के दर्द में की जाती है।
  2. पिसी राई का लेप (थोड़ी देर) छाती की जकड़न और दर्द में; ज़्यादा देर रखने से छाले होते हैं।
  3. राई अचार और तड़के में भूख और पाचन बढ़ाती है।
  4. सरसों का साग आयरन और विटामिन से भरपूर।

आयुर्वेदिक गुण

रस (स्वाद)
कटु (तीखा-चरपरा), तिक्त (कड़वा)
गुण (प्रकृति)
तीक्ष्ण (तेज़ असर वाला), रूक्ष (रूखा, नमी सुखाने वाला)
तासीर
गर्म
दोषों पर असर
कफ और वात को शांत करती है, पित्त बढ़ाती है।

कैसे लगाएँ और देखभाल

अक्टूबर–नवंबर में बीज छिड़कें; धूप, सामान्य मिट्टी। साग के लिए 30–40 दिन, बीज के लिए फरवरी–मार्च।

शब्दावली

कफ
शरीर की नमी और बलगम वाली शक्ति; बिगड़ने पर सर्दी-खाँसी, बलगम, भारीपन और सुस्ती
वात
शरीर की हवा/गति वाली शक्ति; बिगड़ने पर गैस, जोड़ों का दर्द, रूखापन, कब्ज़ और बेचैनी
पित्त
शरीर की गर्मी और पाचन वाली शक्ति; बिगड़ने पर जलन, एसिडिटी, ज़्यादा गर्मी और फोड़े-फुंसी

यह जानकारी पारंपरिक आयुर्वेद और लोक-ज्ञान पर आधारित है और केवल जानकारी के लिए है, इलाज के लिए नहीं। किसी भी बीमारी में डॉक्टर या पंजीकृत आयुर्वेदिक वैद्य की सलाह से ही दवा लें, और चल रही दवा अपने आप बंद न करें। गर्भावस्था, छोटे बच्चों और पहले से दवा ले रहे लोगों को विशेष सावधानी रखनी चाहिए।

इसी तरह के और पौधे